
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के प्रेस क्लब में सोमवार को छत्तीसगढ़ हिंदी पत्रकारिता के भीष्म पितामह माने जाने वाले पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी की 17वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। प्रेस क्लब और छत्तीसगढ़ मित्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय ने कहा कि पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने छत्तीसगढ़ में हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि त्रिवेदी का जन्म 1 जुलाई 1920 को रायपुर में हुआ था और 11 जुलाई 2009 को लगभग 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। बचपन से ही उनमें साहित्य, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति गहरा लगाव था।

डॉ. पाण्डेय ने कहा कि वर्ष 1900 में उन्होंने रायपुर से छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन शुरू किया। इसके बाद वे अग्रदूत, महाकौशल और आलोक जैसी पत्रिकाओं के संपादक रहे। अपनी लेखनी के जरिए उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को लगातार मजबूत किया। कविता, कहानी, निबंध सहित साहित्य की कई विधाओं में उन्होंने महत्वपूर्ण रचनाएं दीं। उनका वीर रस प्रधान खंडकाव्य ‘वीर हरदौल’ विशेष रूप से चर्चित रहा। अपने संबोधन में डॉ. पाण्डेय ने सम्मान, समाज और व्यक्तित्व पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अभिमान तब होता है जब उसे लगता है कि उसने कुछ किया है, लेकिन वास्तविक सम्मान तब मिलता है जब समाज और राष्ट्र यह महसूस करे कि आपने उनके लिए कुछ किया है।

उन्होंने श्रोताओं का अभिनंदन करते हुए कहा कि रायपुर की धरती पर उन्हें जो स्नेह और सम्मान मिला है, वह उनके लिए परम सौभाग्य की बात है। उन्होंने मंचीय परंपराओं और श्रोताओं की भूमिका पर भी रोचक अंदाज में चर्चा की और बताया कि वक्ता और श्रोताओं के बीच तालियों का संवाद भी एक सांस्कृतिक परंपरा है।
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि जीवन ऐसा होना चाहिए जिसे लोग वर्षों बाद भी याद करें। उन्होंने संबंधों में विश्वास, मर्यादा और संवेदनशीलता को सबसे महत्वपूर्ण बताया। इस अवसर पर उन्होंने कार्यक्रम के संयोजक डॉ. सुधीर शर्मा की भी सराहना की और कहा कि उन्होंने पूर्वजों की विरासत को सहेजने का सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के पुत्र और पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. सुशील त्रिवेदी को भी बधाई देते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से दिवंगत पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित होती है। इसी दौरान उन्होंने एक कविता की पंक्तियां भी सुनाईं, जिनमें पूर्वजों की धरोहर को सहेजने की भावना व्यक्त की गई। अपने व्याख्यान में डॉ. पाण्डेय ने हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा शुरू की गई हिंदी पत्रकारिता की परंपरा को छत्तीसगढ़ में पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने छत्तीसगढ़ मित्र के माध्यम से नई पहचान दी।

उन्होंने कहा कि पं. त्रिवेदी ने कभी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया और हमेशा सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा निर्धारित पत्रकारिता के चार मूल सिद्धांत—समय की पाबंदी, मालिक का विश्वास, पाठकों और समाज के हित को प्राथमिकता तथा न्याय के मार्ग से न डिगने—का उल्लेख करते हुए कहा कि पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने इन्हें अपने जीवन में पूरी निष्ठा से अपनाया। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि उन्होंने गुलाम भारत से लेकर आज़ाद भारत तक पत्रकारिता की और जहां भी समाज में विसंगतियां दिखीं, उन्होंने निर्भीक होकर अपनी कलम चलाई। छत्तीसगढ़ के विकास और राष्ट्रीय चेतना को लेकर उनकी सोच उनकी कविताओं और लेखों में साफ दिखाई देती है।

इस दौरान उन्होंने पं. त्रिवेदी की राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत कविता ‘बलिपथ का इतिहास बनेगा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रचना आज भी युवाओं में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने का सामर्थ्य रखती है। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविताओं का भी उल्लेख किया और कहा कि बड़ा व्यक्ति वही होता है जो जीवनभर समाज के लिए काम करता है। उन्होंने कहा कि पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का पूरा जीवन इसी आदर्श का उदाहरण है। डॉ. पाण्डेय ने दिनकर की उन प्रसिद्ध पंक्तियों का भी उल्लेख किया, जिनमें अमर होने का संदेश दिया गया है—ऐसा लिखो कि दुनिया याद रखे या ऐसा काम करो कि जमाना उसका उल्लेख करे। उन्होंने कहा कि पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने अपने लेखन और कर्म से यही कर दिखाया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा ने की। उन्होंने कहा कि पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने अपना पूरा जीवन साहित्य और पत्रकारिता को समर्पित कर दिया। विशिष्ट अतिथि डॉ. गिरीश पंकज और डॉ. शाहिद अली ने भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें समर्पित पत्रकार बताया। उन्होंने रायपुर में पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के नाम पर पत्रकारिता पीठ स्थापित करने की मांग भी रखी।
इस अवसर पर डॉ. सुधीर शर्मा द्वारा संपादित पुस्तक ‘पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी : प्रतिनिधि रचनाएं’ का लोकार्पण मंचासीन अतिथियों ने किया। वक्ताओं ने इस पुस्तक को पं. त्रिवेदी के जीवन और साहित्य को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए डॉ. सुधीर शर्मा को बधाई दी। कार्यक्रम में डॉ. जे.बी. पाण्डेय ने डॉ. गिरीश पंकज, डॉ. शशांक शर्मा, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. सुशील त्रिवेदी, डॉ. शाहिद अली, डॉ. वीणा हाडा, डॉ. सीमा चंद्राकर और डॉ. अंकित भोई को उनके साहित्यिक योगदान के लिए ‘पं. अटल बिहारी साहित्यकार सम्मान-2025’ से सम्मानित किया। उपस्थित लोगों ने करतल ध्वनि के साथ उनका अभिनंदन किया।
संगोष्ठी में डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र, डॉ. वीणा हाडा, शकुंतला तरार, शशि वरवडकर, विजय मिश्र अमित, जशवंत क्लाउड, शिरीष त्रिवेदी सहित अनेक साहित्यकार, पत्रकार और बुद्धिजीवी मौजूद रहे। कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत डॉ. सुधीर शर्मा ने किया। विषय प्रवेश डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कराया, जबकि संचालन डॉ. सीमा चंद्राकर ने किया। फोटोग्राफी की जिम्मेदारी डॉ. अंकित भोई और डॉ. सपना भोई ने निभाई तथा धन्यवाद ज्ञापन मोहन तिवारी ने किया। समारोह के अंत में सुप्रसिद्ध पांडवानी गायिका तिजन बाई तथा प्रेस क्लब के पूर्व उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार सुख नंदन बंजारे के आकस्मिक निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

