
- सुनील सिंह
Jharkhand Politics : वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर सरकार से नाराज हैं। नाराजगी इतनी है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा लौटा दी है। मंत्रिमंडल में वह दूसरे नंबर के मंत्री हैं। फिर भी उनकी नहीं सुनी जा रही है। डीजीपी की बात तो छोड़िए जिस विभाग के वह मंत्री हैं इस विभाग के अधिकारी भी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। यह बड़ी विचित्र स्थिति है। इसका प्रमाण यह है कि 4 साल पुराने एक आदेश को विभाग के संयुक्त सचिव ने वित्त मंत्री के खिलाफ ही इस्तेमाल कर दिया। मंत्री के आप्त सचिव को वाहन लौटाने को लेकर चिट्ठी लिख दी और मंत्री को पता भी नहीं चला। इससे समझा जा सकता है कि विभाग में मंत्री और अधिकारियों के बीच रिश्ते कैसे खराब हो चुके हैं।
मंत्री के पत्र का जवाब डीजीपी नहीं दे रही हैं और विभाग के अधिकारी मंत्री की बात नहीं सुन रहे हैं तो यह साधारण मामला नहीं है। इसके पीछे की राजनीति और साजिश समझने की जरूरत है।
श्री किशोर एक अनुभवी राजनीतिक हैं. राजनीति का दांवपेच समझते हैं। उनको भी पता है कि ऐसे अधिकारियों को कहां से संरक्षण मिल रहा है। इसके पीछे कौन है। इसीलिए वह नाराज हैं।
किशोर पिछले दो-तीन महीने से बगावत के मूड में हैं। पहले उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला और अब उनकी नाराजगी सरकार से भी बढ़ गई है। ऐसे में वह कितने दिनों तक सरकार में रहेंगे इस पर संशय है। पार्टी और सरकार दोनों से नाराजगी के बाद मंत्री पद रहेगा या जाएगा इस पर कयास शुरू हो गया है। तनातनी यदि आगे बढ़ी तो बहुत संभव है कि किशोर खुद त्यागपत्र दे दें।
आखिर विष पीकर कितने दिनों तक सरकार में रहेंगे। ज्यादा विष प्राण घातक साबित होता है। ऐसा लगता है कि जहर तेजी से फैल रहा है। इस्तीफा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उन पर दबाव भी है। कैबिनेट की बैठक में मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने भी वित्त विभाग के कामकाज और फाइल लटकने को लेकर नाराजगी जाहिर की है। यानी मंत्री पर चौतरफा दबाव है।
इधर, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की हार और क्रॉस वोटिंग से भाजपा समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवानी की जीत के बाद इंडिया गठबंधन में जो तनाव था वह अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऊपर से सब कुछ ठीक-ठाक है लेकिन भीतरखाने ठीक नहीं है।
सबसे अहम और गौर करने वाली बात यह है कि पूरे प्रकरण पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मौन हैं। उनकी कोई प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है। उनका मौन रहना भी कुछ कह रहा है। कुछ संकेत दे रहा है. कहीं तूफान के पहले शांति की स्थिति तो नहीं है।
इधर, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन निजी दौरे पर दिल्ली गए हुए हैं, इसी बीच प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आदित्य साहू और प्रतिपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी भी दिल्ली में थे। दोनों नेताओं की मुलाकात राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से हुई और राज्य की राजनीतिक स्थिति सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री और भाजपा नेताओं का एक साथ दिल्ली में होना संयोग भी हो सकता है और इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हो सकते हैं। बहरहाल झारखंड की राजनीति में सब कुछ ठीक नहीं है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

