
- 2 लाख की आबादी न्याय के लिए आज भी काट रही 80 KM की दूरी, गरीबों पर दोहरी मार
राज्य सरकार ने दूरस्थ क्षेत्र के लोगों को सुविधा देने के उद्देश्य से महुआडांड को अनुमंडल का दर्जा दिया था। लेकिन अनुमंडल बने 16 साल बीत जाने के बाद भी यहां कोट-कचहरी की स्थापना नहीं हो सकी है।
नतीजा यह है कि महुआडांड,और गारू प्रखंडों की करीब 2 लाख आबादी को आज भी छोटे-बड़े न्यायिक कार्यों के लिए 80 किलोमीटर दूर लातेहार जाना पड़ रहा है।
कागजों में अनुमंडल, धरातल पर अधूरा
जानकारी अनुसार 2009-10 में महुआडांड को अनुमंडल घोषित किया गया। यहां एसडीओ कार्यालय, एसडीपीओ कार्यालय, अंचल और प्रखंड कार्यालय खुल गए। लेकिन न्याय व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले अनुमंडल न्यायालय को आज तक शुरू नहीं किया गया। यहां न कोई जज है, न सरकारी वकील, न स्टाम्प विक्रेता और न ही वकीलों का चैंबर। ऐसे में जमीन विवाद, मारपीट, पारिवारिक केस और अन्य दीवानी-फौजदारी मामलों के लिए लोगों को लातेहार की दौड़ लगानी पड़ती है।
गरीबों की कमर तोड़ रहा खर्च और समय
महुआडांड से लातेहार तक आने-जाने में ही एक दिन बर्बाद हो जाता है। बाइक या बस का किराया ₹300 से ₹400, वकील की फीस ₹1000 से ₹1500 और अन्य खर्च मिलाकर एक तारीख में गरीब आदमी के ₹2000 तक खर्च हो जाते हैं। एक किसान ने कहा तारीख पर तारीख मिलती है। 5-6 बार जाना पड़ता है। मजदूरी छोड़कर कौन इतना खर्च उठाएगामहिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए यह सफर किसी यातना से कम नहीं। कई लोग पैसों के अभाव में केस लड़ना ही छोड़ देते हैं और अन्याय सहने को मजबूर हैं।
16 साल में सिर्फ वादे, जनता निराश
इस दौरान क्षेत्र से कई जनप्रतिनिधि चुने गए। हर चुनाव में कोट-कचहरी खोलने का वादा हुआ, शिलान्यास की बात हुई, लेकिन फाइलें आज भी अधिकारियों की मेज पर धूल फांक रही हैं।
सामाजिक संगठनों ने कई बार डीसी और सरकार को ज्ञापन सौंपे, आंदोलन की चेतावनी दी, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
अब और इंतजार नहीं: जनता की मांग
क्षेत्रवासियों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, जिला प्रशासन और न्याय विभाग से मांग की है कि महुआडांड में अविलंब अनुमंडल न्यायालय शुरू किया जाए।
इसके लिए न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए ताकि लोगों को उनके दरवाजे पर त्वरित और सुलभ न्याय मिल सके।जनता का कहना है कि जब तक कोट-कचहरी नहीं खुलेगी, तब तक महुआडांड अनुमंडल का सपना अधूरा ही रहेगा।

