
दयानंद राय
हरिनारायण सिंह सर के बारे में सोच रहा हूं तो उनके व्यक्तित्व के कई चित्र दिमाग के कैनवास पर उमड़-घुमड़ रहे हैं। हर चित्र को उसकी सूक्ष्मता के साथ पकड़ने की काबिलियत और सलाहियत मुझमें नहीं है, लेकिन वह भावना तो प्रबल जरूर है जो उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शब्दांजलि अर्पित करना चाहती है। जो पहला चित्र उनकी शख्सियत का शब्दों की पकड़ में आया है वह उस समय का है जब हरि सर हिन्दुस्तान के स्थानीय संपादक थे। उस समय रांची और खासकर झारखंड की पत्रकारिता में उनकी तूती बोल रही थी। हरि सर का हिन्दुस्तान अखबार का चैंबर और उनका लैपटॉप आज भी मेरे जेहन में ताजा है। उनके कार्यकाल में शंभु सर की कृपा से मुझे हिन्दुस्तान में स्ट्रिंगर की नौकरी मिली थी। । मैंने वहां हरि सर को पहली बार देखा था, वे बहुत सख्त मिजाज और समय के पाबंद दिखे थे। इस अखबार में मैं लगभग दो साल रहा। यहां मुझे दो चीजें समझ में आयी थी, वो ये थीं कि हरि सर उम्दा संपादक होने के साथ बेहतरीन रिपोर्टर भी थे, खासकर ग्राउंड रिपोर्टिंग को वे बहुत महत्व देते थे। बस उन्हें खबर का संकेत भर मिलना चाहिए था, सूचना मिलने पर उसे विस्तार देने का काम उन्हें बखूबी आता था। दूसरी बात मुझे ये समझ में आयी कि उनकी टाइपिंग स्पीड बहुत अच्छी है।
संघर्षों से निखरा व्यक्तित्व
हरि सर अपने आप में एक संस्थान थे, संस्थान इसलिए थे कि उन्होंने रांची के कई पत्रकारों को गढ़ा था और उनमें से कई को ऊंचाई पर भी पहुंचाया था। उन्होंने खुद को संघर्षों की आंच में तपकर संवारा था, इसलिए वे खुद कड़ी मेहनत करने के आदि थे और दूसरों से भी यही अपेक्षा रखते थे। झारखंड के कमोबेश हर राजनेता से उनके संबंध थे और इन संबंधों की वजह से राजनीतिक परिदृश्य में घट रही हर घटना की जानकारी उनको रहती थी। मुझे याद है कि आजाद सिपाही में कार्यरत रहने के दौरान वे मुझे लेकर बाबूलाल मरांडी के पास गए थे, उस दौरान बाबूलाल मरांडी के भाजपा में झाविमो के विलय को लेकर अटकलों का बाजार गर्म था। उनके पास पुख्ता सूचना थी कि बाबूलाल अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर रहे हैं।
आजाद सिपाही के प्रधान संपादक बन जाने के बाद आया था परिवर्तन
खबर मंत्र के प्रधान संपादक पद से हटने और एक-दो और संस्थानों में काम करने के बाद आजाद सिपाही अखबार को अपने दम पर खड़े करने के दौरान हरि सर कई झंझावतों से जूझे थे। इन मुश्किलों और बाधाओं से गुजरने के बाद हरि सर बदल गए थे। वर्ष 2020 में जब मैंने आजाद सिपाही अखबार ज्वाइन किया था तो मैंने हरि सर में बड़ा बदलाव देखा था, वे वैसे नहीं थे जैसा वे हिन्दुस्तान के संपादक के तौर पर मुझे दिखे थे, अब वे ज्यादा सहज, ज्यादा सरल हो गए थे। यहां उन्होंने पॉलिटिकल रिपोर्टर के रुप में मुझे मांजने में मेरी मदद की थी। कोई खबर कैसे लिखी जायेगी इसका आउटलाइन वे मीटिंग में ही तय कर देते थे, कई बार उन्होंने मेरे लिखे आलेखों की तारीफ भी की थी।
जब मैंने कहा था कि सर आपको अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए
हरि सर के साथ मैंने करीब चार साल काम किया। इसमें हिन्दुस्तान के समय उनके साथ इंटरेक्शन लगभग नहीं के बराबर था लेकिन आजाद सिपाही में वे अपने पत्रकारीय जीवन के कई किस्से मुझसे शेयर करते थे। उनके बारे में जानकर मैंने कहा था कि सर आपको अपनी आत्मकथा लिखनी चाहिए। मुझे जानकारी नहीं कि मेरी इस बात पर उन्होंने क्या सोचा होगा। आज उनकी पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं।
विनम्र श्रद्धांजलि सर।

