

सुशोभित





चौसा आम अब विदा हो रहा है। इसी के साथ आमों की जो दुकान वसन्त में खुली थी, वह भी अब मंगल होगी। मर्मांतक पटाक्षेप होगा! आमों के देवता शयन करेंगे। चौसा आमों में सबसे आखिर में आता है और अंत तक टिकता है। यह आमों का महेन्द्र सिंह धोनी है! तो चौसा गया मतलब आमों का दौर गया। सबसे अंत में आकर भी यह तमाम आमों में सबसे मीठा है, जैसे कि प्रकृति ने अपना तुरुप का इक्का आखिर के लिए बचा रखा हो। मदहोश कर देने वाली मिठास है इसकी। तीक्ष्ण और वानस्पतिक! खाते ही लगता है जैसे मस्तक में कुछ तड़ित्वान सरीखा कौंध गया है। ध्यान रहे, यह एक ऐसे व्यक्ति का बयान है, जिसने शकर त्याग रखी है। तब किसी भी प्रकार के मीठे के प्रति उसकी ग्राह्यता और संवेदनशीलता साधारणजन से कुछ अधिक ही समझें।
चौसा अपनी मिठास की तीक्ष्णता और वानस्पतिकता के चलते दशहरी के उलट है, जिसकी मिठास में बटर-स्कॉच सरीखी मुलायमियत होती है। मानो आम नहीं मैंगो-कैंडी हो। बड़ा विलायती किस्म का ज़ायका है। उसकी तुलना में चौसा की मिठास जंगली और आदिम है! इसका पुष्ट, हलकी दूधिया सफ़ेदी लिए गूदा देखते ही बतला देता है कि इसमें कितना शहद है!
मीठे के प्रति मुझमें असाधारण आसक्ति हुआ करती थी। मेरी नानी कहती थी- “ऐठो खाये मीठो वासे”। यानी मीठे के लिए तो ‘बबीया’ (मेरे बचपन का नाम) जूठा भी खा ले। कालान्तर में फिर मैंने मिठाई मोहन मिश्र के छद्मनाम से ‘मिठाईलाल की बही’ लिखी, जो ‘माउथ ऑर्गन’, ‘अपनी रामरसोई’ आदि पुस्तकों में धारावाहिक रूप से छपी। उन लेखों में मिष्ठान्न के प्रति मेरी सन्निधि देखते ही बनती है। तब मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरी धमनियों में रक्त और शिराओं में शर्करा दौड़ती है!
फिर मधुमेह नामक वज्रपात हुआ! होना ही था। वीगनवाद के संकल्प ने भी दूध से बनी मिठाइयों के सेवन पर रोक लगा दी। जीवन का नियम तो यही है, जो सबसे प्रिय हो, उसी पर पहले निषेध-सूत्र बँधता है। तो मेरे जैसा माधुर्य का रसलोभी फलों की मिठास पर अधिक निर्भर हो गया। यों फलों में भी ‘ग्लायसेमिक-इंडेक्स’ की भेददृष्टि है कि किसमें यह सूचकांक अधिक और किसमें कम। और चौसा जैसे ‘मीठेचट’ में तो यह निश्चय ही अधिक होता है।
पर जैसा कि हमारे मालवा में कहते हैं- “कईं नी, इत्तो तो चले। नेठूज फीको-फस थोड़ेज रेवाय?”- तो उसी तर्ज़ पर इस वर्ष यदा-कदा चौसा का रसपान चलता रहा। अब चौसा भी जा रहा है। मधुरिमा के अन्तरिक्ष का एक और नक्षत्र टूटकर ध्वस्त हो रहा है। यह निजी रागात्मकता के लोक में एक नन्ही-सी क्षति जैसा है। कोई बात नहीं, हम अगले वर्ष फिर टकटकी बाँधकर हमारे चौसा भाई की आमद का इंतज़ार करेंगे। अगले बरस तू जल्दी आ!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
