पलामू के यदुवंश सहाय भी थे संविधान सभा के सदस्य

Archana Ekka
8 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

प्रभात मिश्रा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण की जब भी बात होगी तो यह चर्चा पलामू के स्व. यदुवंश सहाय के जिक्र के बिना अधूरी ही रहेगी। यदु बाबू के नाम से लोकप्रिय इस महान व्यक्तित्व पर हर पलामूवासी को गर्व होना चाहिए। जिस संविधान से हमारा देश चल रहा है उसके निर्माण में हमारे जिले के निवासी का भी हाथ रहा है। दिल्ली में जहां संविधान सभा के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर रखे गए हैं वहां यदुवंश सहाय के भी हस्ताक्षर हैं। संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को ये हस्ताक्षर किए थे। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत एक गणतंत्र बना। ये देखना व पढ़ना रोमांचित और उत्सुकता पैदा करता है इस हस्ती के बारे में जानने के लिए। यह, अलग बात है कि मुझ जैसे काफी लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि हमारे शहर में इस स्तर का व्यक्ति भी रहा है।

यदुवंश सहाय जी का जन्म 1901 में पलामू के बगल के जिले औरंगाबाद के अंबा प्रखंड के सरडीहा में हुआ था। इनके पिता का नाम नाजिर सहाय जी था। यहीं आरंभिक पढ़ाई हुई। कालेज की पढ़ाई लंगट सिंह कालेज, मुजफ्फरपुर से हुई। उन्होंने वकालत की डिग्री पटना विश्वविद्यालय से हासिल की। औरंगाबाद में वकालत की शुरुआत हुई। वह दौर आजादी की लड़ाई का था तो फिर इससे यदु बाबू भी कैसे बचते। राजनीति में आ गए और शुरू हो गई आजादी की लड़ाई में सहभागिता। इनके मामा पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर थे। वे नहीं चाहते थे कि उनका भांजा राजनीति में जाए। उन्होंने यदु बाबू को औरंगाबाद से डालटनगंज भेज दिया। यहीं जेलहाता में घर भी बना दिया गया।

यदु बाबू डालटनगंज आ तो गए पर यहां की धरती उन्हें किसी और काम की लिए बुला रही थी। वकालत तो शुरू हुई पर आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी और बढ़ गई। 1922 से ही कांग्रेस में सक्रिय रहे यदु बाबू 1930, 32, 40 में भी अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में जेल जा चुके थे। 1946 में बिहार में अंतरिम सरकार के गठन के लिए चुनाव हुआ। इसमें यदु बाबू ने दक्षिण पश्चिम पलामू साधारण ग्रामीण से चुनाव लड़ा। इसमें मिली जीत से ही उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इससे पहले वे 1937 में भी विधायक चुने गए थे। 1939 में वह पलामू डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के डिप्टी चेयरमैन भी चुने गए थे।

नौ अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का आंदोलन शुरू हुआ। यदु बाबू पर अंग्रेजों की निगाह पहले से ही थी और उन्हें आंदोलन शुरू होने के तीन दिन पहले ही छह अगस्त को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें पहले डालटनगंज और फिर हजारीबाग जेल में रखा गया। 1944 में उन्हें छोड़ा गया पर इस शर्त के साथ कि वे पुलिस को खबर किए बिना शहर नहीं छोड़ेंगे। जेल से बाहर आने के बाद उनकी सक्रियता बढ़ गई। कई राष्ट्रीय नेता उनकी प्रतिभा को जान चुके थे। यदु बाबू के बड़े बेटे कृष्ण नंदन सहाय ‘बच्चन बाबू’ भी 1942 की क्रांति के दौरान गिरफ्तार किए गए थे।

1946 में बंगाल के नोआखली में दंगा शुरू हो गया। महात्मा गांधी वहां जा चुके थे। बिहार सरकार की ओर से यदु बाबू को वहां भेजा जाता है। आप महात्मा गांधी के साथ नोआखली के गांव-गांव घूमे। इस दौरान वे न सिर्फ गांधी जी के काफी नजदीक हुए बल्कि उनके विचारों में और ज्यादा परिपक्वता आई। वे गांधी जी के साथ 20 जनवरी से 30 जनवरी 1947 तक रहे थे। लेकिन इससे पहले उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिल चुकी थी। उन्हें 1946 में बनी संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। इस समिति के अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा, अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद और निर्मात्री समिति के अध्यक्ष बाबा साहब भीमराव आंबेडकर थे। संविधान सभा की बैठकों में उन्होंने कई महत्वपूर्ण चर्चाओं में भाग लिया और अपने विचार रखे। यदु बाबू के अलावा पलामू निवासी अमिय कुमार घोष भी संविधान सभा के सदस्य थे। वह 1946 में छोटानागपुर डिवीजन साधारण नागरिक से विधायक चुने गए थे। 1952 में हुए चुनाव में भी वे डालटनगंज से विधायक चुने गए थे।

बृजनंदन सहाय ‘मोहन बाबू’ उनके पुत्र हैं। 88 साल की उम्र में अपने पिताजी की यादों को साझा करते हुए वे कभी भावुक हुए तो कभी उत्साहित। ये पोस्ट उन्हीं से बातचीत के बाद लिखी गई है। मोहन बाबू बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में भाग लेने के दौरान पिताजी ने सबकुछ दांव पर लगा दिया था। पिताजी संविधान सभा की बैठकों में भाग लेने के लिए डालटनगंज से दिल्ली जाते थे। हमें उनके जाने की जानकारी तो रहती थी पर ये कभी पता नहीं चला कि संविधान सभा की बैठक में होता क्या है। हां, इतना भान अवश्य था कि आगे देश जिस संविधान से चलेगा उसमें मेरे पिताजी का भी योगदान होगा।

अभी देश का संविधान लागू हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि यदु बाबू फरवरी के तीसरे सप्ताह में डालटनगंज से बालूमाथ में किसानों की सभा में जाने के क्रम में जीप दुर्घटना में सतबरवा के निकट गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें डालटनगंज लाया गया। उनके सिर में काफी चोट लगी थी। उऩके घायल होने की सूचना पर तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह भी उन्हें देखने डालटनगंज आए थे। उस वक्त यहां कि चिकित्सा व्यवस्था उतनी अच्छी नहीं थी। उन्हें देखने के लिए पटना के दो डॉक्टर एक दिन बीच करके आते थे। इनके नाम थे डॉ. नवाब और डॉ. विजय। इनका प्रयास 25 फरवरी 1950 को असफल हो गया और यदु बाबू ने आखिरी सांस ली। उनके साथ घायल हुए गौरीशंकर ओझा का भी इसके कुछ दिन बाद निधन हो गया।

यदु बाबू के निधन से पलामू ही नहीं पूरा बिहार शोकमग्न हो गया। पटना में कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय सदाकत आश्रम में पार्टी का झंडा झुका दिया गया। अखबारों में में खबर छपी, ‘प्रान्त के प्रिय नेता यदु बाबू की वाहन दुर्घटना में मौत’, ‘श्री यदुवंश सहायकी असामयिक मृत्यु’, ‘सदाकत आश्रम में शोकसभा’, ‘TRIBUTES TO JADU BABU, PROVINCE WIDE MOURNING’। 27 फरवरी को भारतीय संसद में भी एक मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। यदु बाबू के भाई उमेश्वरी चरण (लल्लू बाबू) भी स्वतंत्रता सेनानी थे। 1957 में वे डालटगंज के विधायक बने। सबसे छोटे भाई मदन कृष्ण वर्मा की गिनती शहर के नामी समाजसेवियों में होती है। सबसे बड़े भाई मंगला सहाय दरोगा थे और औरंगाबाद में कार्यरत थे। वहीं से गांव आने के क्रम में घोड़े से गिर जाने के क्रम में उनका निधन हो गया था। उनकी शादी नवादा के पास किसी गांव में हुई थी पर गौना नहीं हुआ था। बाद में उनकी पत्नी, जिन्हें घर में सभी बढ़की अइया कहते थे, डालटनगंज आ गईं और आखिरी समय तक यहीं रहीं।

Share This Article
अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सन्मार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।