

प्रभात मिश्रा





पलामू में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी सिपाही यदुवंश सहाय जी के मित्रों का दायरा काफी बड़ा था। जब वे आजादी की लड़ाई के दौरान हजारीबाग सेंट्रल जेल में थे तभी उनकी मुलाकात प्रख्यात साहित्यिकार रामबृक्ष बेनीपुरी जी से हुई। वह भी गिरफ्तारी के बाद यहीं लाए गए थे। बेनीपुरी जी मुजफ्फरपुर के बेनीपुर गांव के रहने वाले थे। यदु बाबू की पढ़ाई मुजफ्फरपुर में हुई थी। दोनों देशभक्त थे। अंग्रेजों की पराधीनता से कैसे मुक्त हुआ जाए, यही दोनों का सपना था। जेल में धीरे-धीरे दोनों काफी नजदीक आते गए और फिर घनिष्ठ मित्र बन गए। ये रिश्ते कितने मजबूत थे इसका अंदाजा बेनीपुरी जी द्वारा उन्हें ‘भाईजी’ कहने से ही लगाया जा सकता है।हजारीबाग जेल में ही जय प्रकाश नारायण भी गिरफ्तारी के बाद रखे गए थे।
यदु बाबू के सबसे छोटे बेटे अजय नंदन सहाय ‘मुन्नू बाबू’ टेल्को से रिटायर होने के बाद जमशेदपुर में रहते हैं। सबसे छोटे होने के कारण वे अपने माता और पिता दोनों के सबसे दुलारे थे। ‘बाबूजी’ और ‘अइया’ की बात करते हुए वे कई बार भावुक हुए तो कई बार यादों में ऐसे खोए कि लगा कि जैसे सबकुछ सामने घटित हो रहा है। वे बताते हैं, ‘रामबृक्ष बेनीपुरी और बाबूजी की मित्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बेनीपुरी जी ने अपने बड़े बेटे देवेंद्र बेनीपुरी को पढ़ने के लिए डालटनगंज भेज दिया था। देवेंद्र जी को बेनीपुरी जी ने जब हमारे यहां भेजा तो बाबूजी ने उनके रहने की व्यवस्था बाहर के रूम में कर दी। वह स्वभाव से थोड़े चंचल थे। उनकी चंचलता के कारण ही उन्हें हमारे घर भेजा गया था। कभी-कभी उनकी चंचलता कुछ ज्यादा हो जाती थी। एक बार बाबूजी उनपर गुस्सा हो गए और उनका टिन का बक्सा बाहर फेंक दिया। हालांकि बाद में बाबूजी का गुस्सा शांत हो गया और देवेंद्र जी फिर से घर में रहने लगे और जिला स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास कर वापस लौटे।’
मुन्नू बाबू वह दिन कभी नहीं भूलते जब कई साल बाद देवेंद्र जी उनके घर आए। इस समय बेनीपुरी ग्रंथावली का पहला खंड छप चुका था। उन्हें साल तो याद नहीं पर उस समय का सारा परिदृश्य उनके सामने आ जाता है। वह कहते हैं, ‘देवेंद्र भैया के आते ही घर में सभी लोग काफी खुश हुए। उनके स्वागत-सत्कार की तैयारियां होने लगीं पर उन्होंने सबको यह कहते हुए रोक दिया कि उनके यहां आने का मकसद कुछ दूसरा ही है। वह अपना बैग खोलते हैं और कुछ निकालते हैं। अब उनके हाथ में एक किताब थी। यह किताब थी ‘बेनीपुरी-ग्रंथावली पहला खंड’। किताब निकालते ही वे उसपर लिखते हैं ‘अइया को सादर समर्पित’। इसके बाद देवेंद्र जी घर के लोगों से कहते हैं कि वह अपने पिताजी के आदेश से यहां आए हैं। पिताजी ने कहा है कि यह किताब सबसे पहले डालटनगंज जाकर अपनी अइया को भेंट करके आओ। किताब देने के बाद ही देवेंद्र जी अन्न-जल ग्रहण करते हैं।’ (बेनीपुरी ग्रंथावली का पहला खंड 1953 में प्रकाशित हुआ था। इसलिए यह घटना उसी साल की होगी।)
मुन्नू बाबू को अपनी मां (सुमित्रा देवी) से काफी करीब थे। वह बताते हैं, ‘बाबूजी के निधन के बाद मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह घर पर आए हुए थे। साथ में उनके सहयोगी अंबिका शरण सिंह (डिप्टी वित्त मंत्री) भी थे। श्री बाबू अइया से घर की हालत के बारे में बात करते हैं। अइया जब उन्हें बताती हैं कि उनके पास कुछ नहीं है। जिस घर में आप बैठे हैं वह कलकत्ता के किसी व्यापारी के पास गिरवी पड़ा है। इतना सुनने के बाद श्री बाबू काफी सोच में पड़ गए और अंबिका बाबू की ओर देखा और कुछ बातें की। इसके बाद वह वहां से चले जाते हैं। अब सारी जिम्मेदारी अंबिका बाबू पर थी। वह भैया (श्यामनंदन सहाय) को लेकर कलकत्ता गए और जिसके बाद मकान गिरवी पड़ा था उससे बात की और मकान के कागजात वापस लेकर लौटे।’
अपने पिता जी को याद कर मुन्नू बाबू कहते हैं, ‘ मैं घर में सबसे छोटा था और बाबूजी जब बाहर से आते थे तो मेरा नाम लेकर ही दरवाजा खोलने को कहते थे। एक बार उन्होंने मुझे स्लेट और पेंसिल लाकर दिया और साथ बैठा कर कहा कि इस पर लिखने का खूब अभ्यास करो क्योंकि बढ़िया हैंडराइटिंग ही आगे काम देगा। अभी घर की स्थिति थोड़ी ठीक होनी शुरू हुई थी कि बाबूजी हादसे का शिकार हो गए। तब मैं हमीदगंज के स्कूल में पढ़ता था। रास्ते में किसी ने बाबूजी के बारे में बताया और मुझे अस्पताल ले गए। एक दिन मैंने अइया से बाबूजी को देखने की जिद की तो मुझे दरवाजा खोलकर भीतर दिखाया गया। बाबूजी का चेहरा हल्का सा दिखा। 25 फरवरी का दिन हमारे परिवार के लिए सबसे काला दिन था। उस दिन बाबूजी तो चले गए पर यह सीख दे गए कि जब ज्यादा विपत्ति आती है तो झेलने की ताकत भी आ जाती है।’
इसी विपत्ति से ताकत अर्जित करते हुए मुन्नू बाबू ने मैट्रिक की पढ़ाई पलामू जिला स्कूल से पूरी की। वे प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। प्री यूनिवर्सिटी की पढ़ाई एक साल तक जीएलए कॉलेज से की लेकिन 1960 में अपने बड़े भाई श्यामनंदन सहाय के बुलावे पर जमशेदपुर चले आए। यहां उन्होंने टेल्को में बतौर अप्रेंटिस काम शुरू किया और 44 साल नौकरी करने के बाद अधिकारी के रूप में रिटायर हुए। ‘अइया’ भी आखिरी वक्त पर उन्हीं के पास थीं। उन्होंने 24 जनवरी 1993 को अपना नश्वर शरीर त्यागा।
