सुशोभित

नर्मदापुरम में सेठानी घाट, कोरी घाट, सर्किट हाउस घाट, विवेकानंद घाट थोड़ी-थोड़ी दूरी पर ही स्थित हैं। गोंदरी घाट थोड़ा दूर छिटक गया है। किन्तु बांद्राभान घाट तो बिलकुल ही नगर से सुदूर है। बगवाड़ा पुल को लाँघकर वहाँ जाना होता है। वास्तव में, वह नर्मदापुरम के बजाय बुदनी और शाहगंज क़स्बों से अधिक निकट है। बांद्राभान के दक्षिण-तट पर संगम-क्षेत्र है, वहाँ कार्तिक पूर्णिमा पर बड़ा मेला लगता है। किन्तु ‘पल्ले-पार’ कहलाने वाला उत्तर-तट ‘तपोभूमि’ है। यहाँ अनेक महत्त्वपूर्ण मंदिर, आश्रम, साधना स्थल हैं। यहाँ नर्मदा में आकर मिलने वाली तवा नदी का वास्तविक नाम भी ‘तपा’ ही था।
नर्मदापुरम के घाट उत्सव और उपासना के लिए हैं, बांद्राभान के घाट उपरति के लिए, एकान्त-साधना और तपश्चर्या के लिए हैं। यह गुह्यक्षेत्र है। इसे वैदिक-देवता वैश्वानर की तपस्या-स्थली माना गया है। वैश्वानर अग्नि के देवता हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अग्नि ने अपनी तपश्चर्या के लिए एक नदी के तट को चुना!
बांद्राभान में नर्मदा के पाट में बड़ी शिलाएँ हैं। उसकी कगारें भी चट्टानी हैं, जिन्हें लाखों वर्षों में नर्मदा ने घिसकर मोम की तरह चिकना और मृदुल बना दिया है। यहाँ नर्मदा के प्रवाह में वेग है, ओज है, नाद और निनाद है। यहाँ वे वास्तव में जलरव करने वाली ‘रेवा’ हैं। इस जलरव को सुनते-सुनते आप सहज ही ध्यानस्थ और प्रकृतिस्थ हो जाते हैं।
नर्मदापुरम को अपना शांत रस सौंपकर इस निर्जन में नर्मदा जी ने आश्चर्य रस की सृष्टि की है! नगरों में मैले हो रहे अपने आँचल को समेटकर नर्मदा जी इसी तरह सुदूर, विजन, वन-प्रान्तरों में अपने रत्नजड़ित दुकूल को फैला देती हैं। तटरेखा के वृक्षों से वे मौन-संवाद करती चलती हैं। बांद्राभान में नदी-किनारे ही एक प्राचीन हनुमान मंदिर है। मंदिर के साथ ही आश्रम है। मैं वहाँ चला गया। वहाँ मुझे रामानन्दी सम्प्रदाय के एक बड़े ही भव्य और पुरातन दिखलाई देने वाले साधु मिले। मैंने पूछा, “आप यहाँ कितने समय से हैं?” उन्होंने कहा, “इस जन्म में 40 साल हुए। यों बीते चार-पाँच सौ सालों से इसी क्षेत्र में रहता आया हूँ। अनेक जन्म इसी नर्मदा-तट पर बिता दिए!”
एक अन्य आश्रम तपोवन आश्रम है। भार्गव आश्रम थोड़ा भीतर की तरफ़ स्थित है। एक प्राचीन शिव मंदिर भी यहाँ है। यहाँ नर्मदापुरम में मैंने दुर्गाप्रसाद केवट नाम के एक ऑटो-चालक से दोस्ती गाँठ ली है, पिछली यात्रा में भी उन्होंने ही मुझे पूरा शहर घुमाया था। तपोवन आश्रम में मुझे एक केवट-मंदिर दिखलाई दिया तो उन्हें बतलाया। वो चकित हुए। नर्मदापुरम के ही होने के बावजूद उन्हें इसके बारे में मालूम नहीं था। बांद्राभान के इन घाटों, मंदिरों, आश्रमों में एक भिन्न ही ऊर्जा और सुगंध है। मैं यहाँ नदी तो नहीं नहाया, किन्तु जैसे भीतर तक निरंजनता में स्नान कर लिया हो!
नर्मदा की सुदूर बाँक पर जब सन्ध्या झुक आई और नभ, वायु, जल का रंग एक हो गया, तब घाट से उठा। सीधे सेठानी-घाट पहुँचा। वहाँ कुछ देर नर्मदा जी से मौन-संवाद किया। गोंदरी घाट जाना इस बार रह गया। यात्रा से पहले मैंने कहा था कि मैं गोंदरी घाट पर एक दीया लगाऊँगा, वह बात तो रह गई, किन्तु उलटे नर्मदा जी ने ही मेरे भीतर सघन अंत:प्रेरणा की एक दीपमाला आलोकित कर दी है! मेरी दीपावली पूर्ण हुई। मैं यहाँ लौटकर बारम्बार आता रहूँगा।


