सीसीएल का बोकारो कोलियरी का गौरवशाली रहा है अतीत, जानें 125 साल पुरानी कोलियरी के इतिहास को

सवा सौ साल पुरानी बोकारो कोलियरी के स्वर्णिम इतिहास, हजारों कामगारों, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, कोयला उत्पादन, खनन विरासत और बदलते दौर की दिलचस्प कहानी पर विशेष रिपोर्ट।

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राकेश वर्मा, बेरमो

सीसीएल बीएंडके एरिया की बोकारो कोलियरी लगभग सवा सौ साल पुरानी है़ एक समय बोकारो कोलियरी का मैन पावर आठ हजार के करीब हुआ करता था तथा सालाना उत्पादन 15 लाख टन से ज्यादा था. आज मैन पावर मात्र 400 है तथा सालाना उत्पादन 2-3 लाख टन होता है.लोग बताते हैं कि पहले कोयला उत्पादन तथा दक्ष कामगारों के कारण पूरे कोल इंडिया में बोकारो कोलियरी का नाम था.यहां अंग्रेजों की एसएलपी व इस्टर्न रेलवे की कोलियरी हुआ करती थी. इसके बाद हिंद स्ट्रीप माइनिंग कॉरपोरेशन हुआ. इस्टर्न रेलवे की कोलियरी में स्व. राम बिलास सिंह ठेकेदार थे, जबकि हिंद स्ट्रीप माइनिंग कॉरपोरेशन चनचनी का था. इसके बाद एनसीडीसी (नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) आया. बाद में सीसीएल हुआ.

कोल माइंस वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन का था क्रेच हाउस

पहले बोकारो कोलियरी के गांधीनगर में कोल माइंस वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन का एक क्रेच हाउस हुआ करता था. इसमें उस वक्त बोकारो कोलियरी में काम करने छत्तीसगढ़ के महिला व पुरुष कोलकटर बच्चों को क्रेच हाउस में रख कर खदानों में कोयला काटने जाते थे. दिन भर क्रेच हाउस में बच्चों की देखभाल की जाती थी. देर शाम को खदान से लौटने के बाद वे बच्चों को यहां से ले जाते थे.

हिंद स्ट्रीप में माइंस रेस्क्यू स्टेशन हुआ करता था

बोकारो कोलियरी के गांधीनगर तीन नंबर से सटे हिंद स्ट्रीप में माइंस रेस्क्यू स्टेशन हुआ करता था. इसमें छात्रों को माइनिंग की पढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती थी. आइएसएम धनबाद के शिक्षक आकर छात्रों को पढ़ाते थे. पुराने लोग बताते हैं कि यहां उस वक्त बोकारो कोलियरी के गांधीनगर स्थित पावर हाउस से सटे इलाके में पहले एक स्टीम थर्मल पावर प्लांट हुआ करता था. इसका उपयोग कोलियरी में हॉलेज चलाने, माइंस से कोयला लोड टब को उठाने सहित अन्य माइनिंग कार्यों में किया जाता था. बोकारो कोलियरी के चार नंबर स्थित गुलाब फाइल में पहले एक पानी टंकी तथा बेरमो रेलवे गेट के निकट एक फिल्टर प्लांट था. जबकि इससे ही सटी पानी से भरी एक सवाड़ी थी. जहां से कोलकर्मियों को इसी फिल्टर प्लांट से पानी फिल्टर कर आपूर्ति की जाती थी. बेरमो रेलवे गेट के निकट ही उस वक्त इंटक नेता रामाधार सिंह व फुलेना प्रसाद वर्मा रहा करते थे.

हिंद स्ट्रीप माइनिंग कॉरपोरेशन के ठेकेदार चनचनी थे

हिंद स्ट्रीप माइनिंग कॉरपोरेशन के ठेकेदार चनचनी थे, जिनकी काफी चलती हुआ करती थी. चनचनी का काम राय साहब व गौरी बाबू देखा करते थे. इस कंपनी के मैनेजर थे मुकुंद लाल चनचनी.

संडे बाजार में था आयुर्वेदिक अस्पताल तो गांधीनगर अस्पताल का अलग था रुतबा

बोकारो कोलियरी के संडे बाजार में कोल माइंस वेलफेयर सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन के समय आयुर्वेदिक अस्पताल हुआ करता था. इसमें डॉ बी राम गुप्ता एवं डॉ द्विवेदी चिकित्सक थे. बोकारो कोलियरी के गांधीनगर में चिकित्सा सुविधाओं से लैस बड़ा अस्पताल हुआ करता था. अस्पताल का अपना बड़ा दो एंबुलेंस हुआ करता था. इसके अलावा इस अस्पताल में एक बड़ा एक्स-रे मशीन, बड़ा ऑपरेशन थियेटर, महिलाओं के लिए प्रसूति गृह, दवा का बड़ा स्टोर, लेबोरेट्री रूम, पैथोलॉजी विभाग, मरीजों के लिए खाना व नाश्ता के लिए बड़ी रसोई, चिकित्सक के कई कक्ष व फार्मासिस्ट का बड़ा कमरा, मरीजों के बैठने के लिए समुचित व्यवस्था व दवा वितरण के लिए आउटडोर की व्यवस्था, शिशु व टीबी मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड की व्यवस्था थी. रात में किसी मरीज के पहुंच जाने के बाद तत्काल उन्हें इस अस्पताल में चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध करा दी जाती थी. वर्ष 1941 में इस अस्पताल में डॉ राव जैसे काफी चर्चित डॉक्टर हुआ करते थे. इसके बाद डॉ सेन, डॉ एसके राय, डॉ पीआर भट्टाचार्य, डॉ एनएन घोष, डॉ एसके दास, डॉ एआर बनर्जी, डॉ एन पाल, डॉ केपी सिंह, डॉ एसके दास जैसे नामी चिकित्सकों ने अपनी सेवा दी.

गांधीनगर में था कैंटीन

बोकारो कोलियरी गांधीनगर में एक कैंटीन हुआ करती, जहां आलूचॉप, सिंघाडा, जलेबी, रसगुल्ला व चाय वर्करों को मिला करता था. इस कैंटीन में सीसीएल कर्मी मानिकचंद शर्मा व अजीत बनर्जी बैठा करते थे. बोकारो कोलियरी के गांधीनगर तीन नंबर में एक सरकारी बस डीपो था, जिसका उद्घाटन इंटक नेता व पूर्व मुख्यमंत्री स्व बिंदेश्वरी दुबे ने किया था. यहां से सभी स्थानों पर जाने के लिए सरकारी व प्राइवेट बसें आती थी.

चाय का केन लेकर जीप से आते थे एसएम डीडी

बोकारो कोलियरी के काफी चर्चित पीओ सुरेंद्र मोहन डीडी अपने साथ जीप में स्टील के एक बड़े केन में चाय लेकर बोकारो कोलियरी एक्सकैवेशन आते थे. यहां वे डंपर, डोजर व शॉवेल ऑपरेटरों को बुलाकर पानी व चाय पिलाते थे तथा उनसे एक ट्रिप और करने का आग्रह करते थे. ऑपेटर भी खुश होकर उनका कहा मान लेते थे. बोकारो कोलियरी के एक अन्य पीओ जेएन उप्पल भी उस दौर में सुबह नौ बजे तक बोकारो कोलियरी की सभी माइंस में पैदल ही घूम लिया करते थे तथा शाम को ऑफिस में आकर बैठते थे. जेएन उप्पल बाद में इसीएल के सीएमडी तो बोकारो कोलियरी के मैनेजर व पीओ रहे बी अकला बाद में सीसीएल के सीएमडी के पद पर आसीन हुए.

साफ सफाई के लिए था बेडफोर्ड कंपनी का ट्रक

बोकारो कोलियरी में उस जमाने में साफ-सफाई के लिए वेडफोर्ड कंपनी का ट्रक हुआ करता था. इन ट्रकों से कचरों की ढुलाई की जाती थी. वेडफोर्ड का ड्राइवर बाला हुआ करता था. इसके अलावा यहां पानी के बड़े-बड़े टैंकर थे, जिससे कॉलोनियों में पानी आपूर्ति होती थी. काफी संख्या में स्कूल बस थीं. विलिस जीप में अधिकारी चला करते थे. जबकि सुरक्षा विभाग के अधिकारी बुलेट मोटरसाइकिल से चलते थे. कामगारों को माइंस ले जाने व ले आने के लिए शिफ्ट वाहन हुआ करता था. वहीं हर माह कामगारों को विभागीय ट्रक से जलावन कोयला दिया जाता था.

काफी संख्या में थे छत्तीसगढ़ के कोयला मजदूर

बोकारो कोलियरी में छत्तीसगढ़ के कोयला मजदूर काफी संख्या में काम किया करते थे. यहां के कई कोयला मजदूरों ने अपने पूरे शरीर में राम नाम का गोदना गुदवा रखा था. इसमें बोकारो कोलियरी के कोलकटर तथा छत्तीसगढ़ के मड़ईभाठा निवासी माया राम रात्रे व घबोध निवासी जयनंदन बंजारे सहित कई लोग थे. छत्तीसगढ़ समाज से जुड़े लोग अपने पूज्य गुरु गुरु घांसी दास बाबा की जयंती काफी धूमधाम से मनाते थे. बोकारो कोलियरी के चार नंबर में गुरु घांसी दास बाबा का जय स्तंभ था, जिसे छत्तीसगढ़ समाज से जुड़े गुलाब सिंह सरदार ने स्थापित किया था. हर साल जाड़े के दिनों में कई मजदूर धौड़ों में नवधा रामायण यानी नौ दिनों तक रामायण पाठ होता था.

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।