
पुष्यमित्र
बुधवार को जब बीजेपी ने बाकीपुर उपचुनाव के लिए अपने कैंडिडेट अभिषेक कुमार का नाम घोषित किया, तब पटना के बीजेपी मुख्यालय के पास से ही गुजर रहा था। सोचा झांक लिया जाये। वहां भी खबर थोड़ी देर पहुंची थी, दिल्ली आलाकमान के द्वारा जारी लेटर के जरिये। पहले को भाजपा कार्यकर्ताओं ने ही एक दूसरे से पूछा अभिषेक कौन है। फिर किसी ने कहा, अरे वही अभिषेक बंटी, जो नितिन नवीन जी का काम संभालता है। किसी ने जवाब दिया, अरे वाह, बंटिया का किस्मत खुल गया।
दरअसल किसी ने सोचा नहीं था कि नितिन नवीन के चुनाव के दौरान हर तरह की व्यवस्था संभालने वाले अभिषेक बंटी को बाकीपुर का टिकट मिल जायेगा। क्योंकि चर्चा में उसका दूर-दूर तक नाम नहीं था। खबर थी कि प्रदेश मुख्यालय ने तीन नाम भेजे हैं। पहला अजय आलोक, दूसरा रणवीर नंदन, तीसरा नील रतन घोष। नील रतन नितिन नवीन और उनके पिता दोनों के करीबी थे, दोनों का काम संभालते थे। कायस्थ भी थे, हां बंगाली थे। लेकिन लोगों को लग रहा था कि नील रतन को टिकट मिल सकता है। मगर उम्रदराज बंगाली कायस्थ के बदले दिल्ली ने नौजवान बिहारी कायस्थ पर मुहर लगाई। इससे पहले कि कोई कंफ्यूजन और बढ़ता, नितिन नवीन ने खुद फोटो के साथ पोस्ट करके सूचना दे दी कि टिकट पाने वाले “ अभिषेक कुमार सिन्हा बंटी” हैं। अब इस नाम में अभिषेक बंटी का पूरा पोलिटिकल बायोडाटा मौजूद है। वे सिन्हा भी हैं और नितिन नवीन के करीबी भी।
मगर इस बीच भाजपा कार्यालय में मौजूद 35 से 65 साल के कई नेताओं, कार्यकर्ताओं के चेहरे पर उदासी के भाव कुछ इस तरह आकर गुजर गये, जैसे वे कह रहे हों, हाय हम क्यों न हुए। हममें क्या कमी थी, अभिषेक बंटी में कौन से हीरे जड़े थे। थोड़ी देर बाद अभिषेक बंटी का वीडियो स्टेटमेंट भी पर आ गया. मुझ जैसे छोटे कार्यकर्ता को आगे बढ़ाया गया है। पास खड़े एक भाजपा नेता ने कहा, “छोटे कार्यकर्ताओं का ही समय आ गया है।” वे अगली लाइन बोल नहीं पाये. तो मैंने पूरी कर दी। हां, अब सीनियर लोगों को मार्गदर्शन मंडल में चले जाना चाहिए। वैसे भी जिस रोज नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, उसी रोज तय हो गया था कि भाजपा में जेनरेशन शिफ्ट हो गया है। अब हर नया मौका उनसे जूनियर को ही मिलेगा।
कार्यालय के बाहर खड़े 40-50 नेताओं में जितने थे, वे सब 40 से ऊपर वाले थे। वे बनावटी स्वर में केंद्रीय नेतृत्व की नीतियों की तारीफ कर रहे थे, मगर अंदर ही अंदर खुद के लिए सीमित होते अवसरों का दुख महसूस कर रहे थे। जैसे सीनियर होना गुनाह हो गया हो। तभी एक भदेस 55 के करीब का नेता चीखने लगा, “बताइये दो पन्ने का ड्राफ्ट लिखना नहीं आता है, टिकट दे दिया, हम शिकायत करेंगे इस बात की।” यू-ट्यूबरों ने उसके आगे माइक लगा दिया। पता नहीं उसका वीडियो चला या नहीं। मगर किसी भाजपाई ने उसे रोका नहीं। वहां जितने भाजपा नेता कार्यकर्ता खड़े थे, उनमें से ज्यादातर ने अपनी आधी से अधिक जिंदगी पार्टी को दी थी। वे सब इमानदारी से पार्टी के लिए काम करने वाले होंगे। मगर वे महसूस कर रहे थे कि कुछ है जो उनमें मिसिंग है। वरना आज उन्हें भी टिकट मिल सकता था।
क्या मिसिंग है? शायद बढ़ती उम्र, शायद बड़े नेता का करीबी होना, सेवा भाव से उसका दिल जीत लेना? जाति? मैं सोच रहा था कि भाजपा जिसे आम कार्यकर्ता को आगे बढ़ाना कहती है, वह क्या इतना सरल और सहज है? क्या इस कोशिश में कोई पैमाना होता है कि इस आधार पर किसी जमीनी कार्यकर्ता को आगे बढ़ाना है, इस आधार पर नहीं. क्या यह पैमाना कभी सार्वजनिक होता है, क्या कभी इसकी खुली प्रतिस्पर्धा होती है? आप पूछेंगे, यह सवाल सिर्फ भाजपा से क्यों? हां, सही बात है। दूसरे दलों में भी यही होता है। मगर भाजपा में हाल के वर्षों में योग्यता के बदले यस मैन को अधिक तरजीह दी जाने लगी है। पार्टी सोचती है कि इसका उसके आम कार्यकर्ताओं पर क्या असर होता होगा?
दूसरी बात, भाजपा में अब यह परंपरा है कि अच्छा नेता वही है जिसने चुनावी प्रबंधन किया हो। जनता के बीच जाकर संघर्ष करना और विचारों से संपन्न होना अब कोई राजनीतिक गुण नहीं है। अभिषेक बंटी के चयन ने भाजपा के आम कार्यकर्ताओं को क्या मैसेज दिया है? जमीन पर काम करने का एक ही मतलब है, किसी नेता का चुनाव प्रबंधन देखना, उसके साथ फोटो खिंचाना, उसके निजी और राजनीतिक इंतजामों को देखना। अगर इसी का मतलब जमीनी कार्यकर्ता है, तो भाई चयन अच्छा है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

