नयी दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी प्रदर्शन में केवल शामिल होने से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति की पुलिस के निर्देशों की अवहेलना करने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने की साझा मंशा थी। न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की एक अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
दिल्ली पुलिस ने अभ्यर्थी के खिलाफ 2025 में रामलीला मैदान में प्रदर्शन स्थल खाली करने की बार-बार घोषणा किए जाने के बावजूद वहां से नहीं हटने के आरोप में मामला दर्ज किया था।

याचिकाकर्ता पिछले साल अगस्त में एसएससी की प्रवेश परीक्षा के आयोजन में कथित अनियमितताओं के विरोध में रामलीला मैदान में आयोजित प्रदर्शन में शामिल हुआ था। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि प्रदर्शन की अनुमति के लिए निर्धारित समय समाप्त होने के बाद भी कुछ लोगों ने प्रदर्शन खत्म करने से इनकार कर दिया था। पुलिस ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी मांगें पूरी होने तक प्रदर्शनकारियों को स्थल पर डटे रहने के लिए उकसाया था। पुलिस ने प्राथमिकी में आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया।
प्राथमिकी के मुताबिक, वे मैदान में डटे रहे और उनमें से कुछ ने पुलिसकर्मियों को धक्का दिया तथा उनके साथ हाथापाई की।
अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए कहा कि न तो प्राथमिकी और न ही बाद में दाखिल स्थिति रिपोर्ट में उसके किसी विशिष्ट आपराधिक कृत्य का उल्लेख किया गया है।
अदालत ने कहा कि अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर अपराध करने की साझा मंशा के अभाव में केवल प्रदर्शन स्थल पर मौजूद होना भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 223(ए) के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस कानूनी प्रावधान के तहत किसी लोक सेवक द्वारा विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा करने पर दंड का प्रावधान है। अदालत ने कहा कि इसके लिए संबंधित व्यक्ति को उस आदेश की जानकारी होनी चाहिए और उसकी अवज्ञा से कानूनन काम कर रहे लोगों के कार्य में बाधा, परेशानी या अन्य व्यवधान उत्पन्न होना चाहिए अथवा इसकी आशंका होनी चाहिए।
अदालत ने 13 अक्टूबर को जारी आदेश में कहा, “कथित अवज्ञा में याचिकाकर्ता की जानबूझकर भागीदारी या अपराध करने की साझा मंशा का संकेत देने वाले साक्ष्यों के अभाव में उसे केवल प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद होने के कारण आपराधिक कार्यवाही का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में उसके खिलाफ कार्यवाही जारी रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं होगा।”
अदालत ने कहा, “एक ही प्रदर्शन में केवल शामिल होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि किसी व्यक्ति की वैध निर्देशों की अवहेलना करने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने की साझा मंशा थी। रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों में ऐसा कोई आधार नहीं है जिसके जरिए याचिकाकर्ता की ऐसी साझा मंशा निर्धारित की जा सके।”


