नयी दिल्ली : वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (जीवीसी) से भारत का जुड़ाव बढ़ाना, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का बेहतर इस्तेमाल करना निर्यात तथा उच्चस्तरीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है। डेलॉयट इंडिया ने यह बात कही है। डेलॉयट इंडिया के साझेदार अनिल तलरेजा ने कहा कि भारत को बहु-माध्यम (मल्टीमॉडल) निर्यात गलियारों के जरिये माल ढुलाई की लागत घटाने के साथ बंदरगाह, परिवहन, भंडारण, रेल संपर्क और अंतिम छोर तक माल पहुंचाने की लागत कम करने पर ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने प्रमुख निर्यात बाजारों में बदलते व्यापार नियमों, कार्बन सीमा समायोजन उपायों (सीबीएएम), उत्पाद मानकों और अन्य आवश्यकताओं पर नजर रखने के लिए ‘प्रतिक्रिया प्रकोष्ठ’ बनाने का सुझाव दिया। तलरेजा ने कहा कि भारत के निर्यात आधारित विनिर्माण को बड़े पैमाने के उत्पादन और असेंबली से आगे बढ़ाकर प्रौद्योगिकी, मूल्यवर्धन और जीवीसी में गहरे एकीकरण पर ध्यान देना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, दवा, पूंजीगत सामान, रक्षा, वैमानिकी और स्वच्छ प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। डेलॉयट ने महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में जोखिम कम करने, एफटीए को औद्योगिक रणनीति के अनुरूप बनाने और उलट शुल्क ढांचे की समीक्षा करने का सुझाव दिया।
एमएसएमई के लिए मुक्त व्यापार समझौतों के तहत रियायती शुल्क का बेहतर लाभ उठाने को मूल स्थान के नियमों, मानकों और दस्तावेजीकरण संबंधी आवश्यकताओं के अनुपालन में सरकारी मदद देने की जरूरत बताई गई है। एमएसएमई देश के कुल निर्यात में करीब 48.58 प्रतिशत और विनिर्माण क्षेत्र में 45 प्रतिशत का योगदान करते हैं। तलरेजा ने एमएसएमई के लिए किफायती व्यापार वित्त की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत भी बताई। उन्होंने कहा कि गारंटी की एवज में कुछ रखने की सीमित सुविधा की वजह से एमएसएमई को निर्यात से पहले और बाद में कर्ज लेने में कठिनाई होती है, जिससे उनकी वित्तीय लागत बढ़ती है।


