

पुष्यमित्र
ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि देखता हूं, लोगों में जानकारी और मुद्दों की समझ का घनघोर अभाव है। जब पहली बार मैंने फरक्का पर पोस्ट लिखा था, तो ऐसा लगा था कि बिहार का हर समझदार आदमी कम से कम फरक्का बराज के खतरे से परिचित होगा। मगर कल जब सुधाकर सिंह जैसे जानकारी से भरे रहने वाले सांसद को सुना, जो फरक्का बराज को हटाने की बात कहने वालों को कालिदास कह रहे हैं, तो लगा कि आमलोगों में अभी भी इस मुद्दे को लेकर जानकारी और तथ्य का अभाव है। इसलिए सोचा कि इस मुद्दे पर विस्तार से बात की जाये।





तो जैसा मैंने पहले कहा, आपको गंगा चाहिए या चाहिए सिर्फ गंगा का पानी। दरअसल कम सुधाकर सिंह यह तो कह रहे थे कि बिहार को गंगा का पानी चाहिए, मगर वे इस बात को समझ नहीं पा रहे थे कि गंगा रहेगी, तब तो गंगा का पानी रहेगा। मुर्गी रहेगी, तब तो मुर्गी अंडे देगी। फरक्का बराज के बनने के 50 साल के भीतर गंगा नदी रोज कैसे तिल-तिल मरती है, यह समझदारी जब तक नहीं होगी, मुद्दा समझ नहीं आयेगा। तो इस बातचीत में सबसे पहले हम गंगा को समझते हैं और समझते हैं बिहार से उसका रिश्ता। उत्तराखंड के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलने वाली गंगा नदी, भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल होते हुए 2071 किमी का सफर तक करके बंग्लादेश पहुंचती है और वहां पद्मा नदी के नाम से बहते हुए लगभग 450 किमी का सफर तय करती है। गंगा बिहार में बक्सर के पास से प्रवेश करती है और भोजपुर, पटना, बेगुसराय, मुंगेर, भागलपुर, कटिहार आदि जिलों से होते हुए साहिबगंज में झारखंड में प्रवेश करती है। बिहार में भी गंगा तकरीबन उतनी ही लंबाई में बहती है, जितनी बांग्लादेश में। यानी कुल 445 किमी।
मगर बिहार से गंगा का रिश्ता देने का है। यहां सोन, घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कोसी और महानंदा, पुनपुन जैसी नदियां अपना पानी गंगा को देती हैं। इन नदियों में कमला, बागमती, अधवारा आदि नदियों का भी पानी होता है. इसी वजह से लीन पीरियड यानी जनवरी ये अप्रैल के बीच गंगा सिर्फ 400 क्यूमेक पानी लेकर बक्सर आती है और फरक्का पहुंचते-पहुंचते इतना पानी होता है कि वह बांग्लादेश को 1500 क्यूमेक दे देता है। यही वह मसला है, जिसको लेकर बिहार के राजनेता केंद्र सरकार से बांग्लादेश के साथ जल-संधि पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं। ताकि बिहार को उसके हिस्से का पानी मिलता रहे। इसी वजह से 1996 की संधि का विरोध हो रहा है।
मगर सवाल सिर्फ पानी का नहीं है। सवाल यह है कि आज से महज कुछ दशक पहले गंगा में इतना पानी होता था कि हाथी बह जाता था।(हाथीदह नाम तो इसी वजह से पड़ा), उस गंगा में जहाज चलाने के लिए ड्रेजर से खुदाई क्यों करनी पड़ रही है। मैंने अपने बचपन में गंगा में बड़े-बड़े जहाजों को चलते हुए देखा है। मुंगेर से जब जहाज से खगड़िया जाता तो हवा तेज होने पर लगता कि जहाज समुद्र में हिलकोरे मार रहा है। उस गंगा में अब पानी क्यों नहीं है। उसकी वजह है कि टिहरी से लेकर फरक्का तक गंगा में कम से कम एक दर्जन बांध और बराज हैं। जानकार कहते हैं कि टिहरी (उत्तराखंड) में गंगा के गले में फंसी लगा दी गई है तो फरक्का में उसका मल-द्वार बंद कर दिया गया है। अब गंगा बहे तो कैसे बहे। मगर जब आप गंगा के दर्द को नहीं समझेंगे तो क्या आपका काम चल जायेगा?
अब आते हैं फरक्का बराज पर। 1960 के दशक में यह बनना शुरू हुआ था और 1975 में बनकर तैयार हो गया। मगर सवाल यह है कि फरक्का बराज क्यों बना? दरअसल कुछ वर्षों से हुगली नदी गाद से भरने लगी थी, इसके कारण समुद्री जहाज कलकत्ता तक पहुंच नहीं पा रहे थे। एक दफा 19वीं सदी के आखिर में एक अंग्रेज अधिकारी ने सोचा था कि क्यों न गंगा की धारा मोड़कर उस पर एक बराज बनाया जाये और वहां से तेजी से पानी छोड़ा जायेगा, जिससे हुगली से गाद निकल जायेगा। उस पानी में जहाज के आने-जाने की सुविधा हो जायेगी। अंग्रेजों ने तो इस योजना पर काम नहीं किया, मगर आजादी के बाद भारत सरकार ने इस पर काम करना शुरू कर दिया। उस दौर में एक इंजीनियर हुए कपिल भट्टाचार्य, आप उनका नाम गूगल कीजिये या चैट-जीपीटी से पूछ लीजिये, कई जानकारियां मिलेंगी।
कपिल भट्टाचार्य ने कहा, फरक्का पर बराज बनाना गंगा के लिए आपदा का कारण बनेगा। उनका कहना था, हुगली में गाद की वजह दामोदर वैली कारपोरेशन और एक दूसरी परियोजना है। अगर हुगली से गाद हटाना है, तो उस पर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि फरक्का बराज से हुगली की गाद हटेगी या नहीं मगर अप-सट्रीम यानी बराज से पहले की धारा के तमाम इलाकों में गंगा गाद से भर जायेगी और वह भीषण कटाव करेगी. और उनकी बात पूरी तरह सच साबित हुई। हालांकि उस वक्त उन्होंने जब यह कहा था तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उन्हें देशद्रोही तक कहा गया। क्योंकि बांग्लादेश तब पाकिस्ताऩ था, वहां फरक्का बराज को लेकर विरोध था। लोगों को लगता था कि कपिल भट्टाचार्य पाकिस्तान से पैसे लेकर यह सब कह रहा है। हर जमाने में सच बोलने वालों को देशद्रोही कहा जाता है।
बहरहाल नदी और पर्यावरण को लेकर काम करने वाली संस्था सैंनड्रैप ने हाल ही में फरक्का पर एक विस्तृत रिपोर्ट की है। इसके मुताबिक गंगा हर साल करीब 736 मिलियन टन गाद लेकर आती है। इसमें से लगभग 328 मिलियन टन गाद फरक्का के अप-सट्रीम यानी बराज के पहले जमा हो जाती है. इससे नदी की तलहटी ऊंची होती है, नदी उथली हो जाती है और उसका प्रवाह अपना रास्ता बदलने लगता है। रिपोर्ट के अनुसार फरक्का के आसपास गंगा के इस बदलते मिजाज ने बड़े पैमाने पर कटाव को बढ़ाया है. मालदा में अब तक हजारों हेक्टेयर जमीन गंगा में समा चुकी है।
उसका असर सिर्फ मालदा में नहीं है। कटिहार, भागलपुर, मोकामा हर जगह गंगा का कटाव होता रहता है। गांव के गांव गंगा में समा रहे हैं। चूंकि फरक्का में गंगा नदी पर दरवाजा लग गया है तो कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक जैसी नदियां भी गाद से भर रही हैं, आखिर उनका गाद जाये तो कहां जाये। हालांकि इसमें उन पर बने तटबंधों का भी असर है, क्योंकि जहां बराज गाद को पानी के साथ बहने से रोकता है, वहीं तटबंध उसे फैलने नहीं देते। ऐसे में बिहार की तकरीबन सभी नदियां गाद से भरी हुई हैं, उनमें पानी बहने की जगह नहीं है। नदियां गाद की वजह से रास्ता बदलती हैं, तो कटाव होता है। बिहार में इस विनाश की सबसे बड़ी वजह फरक्का बराज है। अब सवाल यह है कि क्या फरक्का बराज हटा देने से बंगाल की खाड़ी से होने वाला समुद्री व्यापार बंद हो जायेगा? जैसा सुधाकर कहते हैं। बिल्कुल नही।
पहली बात, फरक्का बराज से पहले क्या समुद्री व्यापार नहीं होते थे? आज से कहीं अधिक जहाज तब गंगा में चलते थे, आज तो गंगा में जहाज चलाना मुश्किल है, गाद की वजह से। दूसरी बात, यह सच है कि हुगली में जहाज चलाना मुश्किल होगा। मगर क्यों सिर्फ हुगली के जहाजों की फिक्र हो, उसकी वजह से बिहार के हजारों गांवों और शहरों की कुर्बानी क्यों दी जाये। अगर जहाज हुगली तक नहीं आ सकते तो जहाज जहां तक आयेंगे, वहां गाड़ियां पहुंचेंगी। इतनी सुविधा आपको चाहिए तो उसकी कीमत बिहार औऱ गंगा नदी क्यों चुकाये?
दूसरी बात, आप एक बार फरक्का का बराज हटाकर देखिये, पानी की धारा दस साल में ज्यादातर गाद को बहाकर समुद्र में पहुंचा देगी। हुगली के गाद को भी साफ कर देगी। तीसरी बात, क्या बराज नहीं होंगे तो सारा पानी बाग्लादेश में चला जायेगा? बिहार सूखा मरेगा? बिल्कुल नहीं। जैसे ही गाद कम होगा। गंगा की गहराई बढ़ेगी और वहां पानी रिटेन करने की क्षमता भी। जो पुराने लोग हैं, उन्हें याद होगा कि गंगा में कभी सूखे दिनों में पानी की कमी नहीं होती थी। यह कमी फरक्का बराज बनने के बाद ही शुरू हुई है। इसलिए जितना जरूर जलसंधि पर बात करना है, उससे ज्यादा जरूरी फरक्का बराज को हटा देने पर बात करना है।
वैसे भी अगर आप फरक्का बराज को नहीं हटाते तो वहां जाकर देखिये, कुछ ही दशक में इतना गाद वहां जमा होगा कि सारे फाटक ढक जायेंगे। फिर फाटक खोलिये, या बंद रखिये, कोई असर नहीं होगा। आखिरी बात, सवाल सिर्फ फरक्का का नहीं है। गंगा पर टिहरी से लेकर फरक्का तक बने 12 अवरोधकों का है, जो कदम-कदम पर गंगा का पानी रोकते हैं, एक वक्त गडकरी जी ने कहा था कि गंगा पर हर सौ किमी पर एक बराज होना चाहिए। मतलब वे एक और तबाही को बुला रहे हैं। आप इसे समझें और समझकर तय करें कि फरक्का हटाने की मांग कालिदास बनना है, या समझदारी। यह संयोग की बात है कि जदयू और संजय झा जैसे लोग पर्यावरण के इस मुद्दे को लेकर अपनी बात रख रहे हैं। हो सकता है, इसके पीछे अडानी का एजेंडा हो। मगर मूल बात यह है कि फरक्का हटेगा तो बिहार और गंगा दोनों का भला होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
