अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री निजी जानकारी का मामला है, इसलिए केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) को गुजरात विश्वविद्यालय को इसे सार्वजनिक करने का निर्देश देने के बजाय इस संबंध में निर्णय लेना संबंधित व्यक्ति के विवेक पर ही छोड़ देना चाहिए था।

उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सीआईसी के 2016 के आदेश को रद्द करने और उन पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाने वाले एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी थी।
खंडपीठ ने कहा कि मोदी की डिग्री ‘‘आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(ई) और (जे) के दायरे में आने वाली व्यक्ति की निजी जानकारी है, जिसे सार्वजनिक किये जाने से छूट प्राप्त है और प्रतिवादी विश्वविद्यालय को इसका खुलासा करने के लिए नहीं कहा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की खंडपीठ ने मंगलवार को पारित अपने आदेश में कहा, ‘‘खुलासा की जाने वाली किसी भी जानकारी को सार्वजनिक हित या व्यापक सार्वजनिक हित में जाहिर करने के लिए आवश्यक नहीं कहा जा सकता है।’’
आदेश का विवरण बुधवार को उपलब्ध हुआ।
उच्च न्यायालय ने मंगलवार को केजरीवाल की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री का खुलासा करने का निर्देश देने वाले आदेश को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा और सीआईसी के निर्देश को रद्द करने तथा दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री पर जुर्माना लगाने के फैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं पाया।
उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि जहां तक मोदी की शैक्षणिक डिग्री के बारे में लोगों की आम जिज्ञासा से जुड़ी सीआईसी की टिप्पणियों का सवाल है, तो इसकी जानकारी सार्वजनिक करने का फैसला संबंधित व्यक्ति (प्रधानमंत्री) के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए था, जो सार्वजनिक पद पर हैं।
उच्च न्यायालय ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री से जुड़ी जानकारी अपने आप ‘‘जनहित या व्यापक जनहित’’ के दायरे में नहीं आएगी।
अदालत ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1)(ई) और (जे) कुछ खास छूट देती है जो भरोसे वाले रिश्तों और निजी गोपनीयता को अनिवार्य रूप से जानकारी का खुलासा करने से बचाते हैं, जब तक कि कोई बड़ा जनहित न हो।
उच्च न्यायालय ने कहा कि देश का नागरिक होने के नाते, किसी लोक सेवक को सिर्फ इसलिए अपनी निजी जानकारी का खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह किसी (सार्वजनिक) पद पर है या लोक सेवक है, जब तक कि वह या जानकारी रखने वाला अधिकारी आरटीआई अधिनियम एक्ट के तहत इसका खुलासा करने के लिए आबद्ध न हो।


