

रांची: राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति नियमावली में अचानक बदलाव कर लिखित परीक्षा अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव पर नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक संघ, रांची विश्वविद्यालय ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। संघ ने इस नए प्रस्ताव को पूरी तरह अव्यावहारिक, दमनकारी और वर्षों से सेवा दे रहे उच्च शिक्षित युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया है।
इस विषय पर विस्तृत बयान जारी करते हुए संघ के वरिष्ठ प्रतिनिधि डॉ. त्रिभुवन साही ने सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं और साफ कहा है कि कोई भी नया नियम थोपने से पहले सरकार को उन शिक्षकों की सुध लेनी होगी, जिन्होंने अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष इस राज्य की उच्च शिक्षा को संवारने में लगा दिए हैं।





डॉ. त्रिभुवन साही ने कहा, “मीडिया में आ रही खबरों से ऐसा प्रतीत होता है कि नियुक्तियों को पारदर्शी बनाने के नाम पर यह बदलाव किया जा रहा है। हम सरकार और समाज को यह याद दिलाना चाहते हैं कि वर्तमान में कार्यरत सभी नीड-बेस्ड सहायक प्राध्यापक किसी ‘बैकडोर एंट्री’ या अनौपचारिक तरीके से नहीं आए हैं। हम सभी सरकार द्वारा बकायदा जारी विज्ञापन (विज्ञप्ति) के आधार पर, राजभवन और सरकार के प्रावधानों के तहत गठित उच्चस्तरीय चयन समिति (इंटरव्यू बोर्ड) के समक्ष उपस्थित हुए और पूरी तरह पारदर्शी साक्षात्कार प्रक्रिया के माध्यम से चयनित होकर आए हैं।”
ये शिक्षक पिछले साढ़े आठ वर्षों से राज्य के विभिन्न अंगीभूत एवं संबद्ध महाविद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि ये सभी नियुक्तियां स्वीकृत पदों (Sanctioned Posts) के विरुद्ध की गई थीं। जब विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी थी और कॉलेज बंद होने की कगार पर थे, तब इन नीड-बेस्ड शिक्षकों ने न्यूनतम मानदेय पर दिन-रात मेहनत करके झारखंड के गरीब और आदिवासी-मूलवासी छात्र-छात्राओं का भविष्य बचाया। आज जब वे ओवरएज (उम्र सीमा पार) होने की कगार पर हैं, तब उन्हें फिर से एक नई परीक्षा के चक्रव्यूह में धकेलना अमानवीय है।
संघ का कहना है कि कार्यरत सभी सहायक प्राध्यापक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के कड़े मानकों को पूरा करते हैं। इनमें से सभी शिक्षक NET, JET या Ph.D. जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यताओं से सुसज्जित हैं। इसके साथ ही उनके पास करीब एक दशक का अकादमिक और व्यावहारिक शिक्षण अनुभव है। दुनिया का कोई भी नियम वर्षों के क्लासरूम टीचिंग के अनुभव को एक लिखित परीक्षा से ऊपर नहीं मान सकता। हमारी योग्यता और अनुभव ही हमारी सबसे बड़ी पात्रता है।
नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक संघ ने झारखंड की ‘अबुआ सरकार’ को उनके वादे याद दिलाते हुए सीधे तौर पर मांग की है:
पहले नियमितीकरण, फिर नई नीति: सरकार सबसे पहले राज्य के सभी विश्वविद्यालयों में कार्यरत नीड-बेस्ड सहायक प्राध्यापकों की सेवा को रैगुलराइज (Regularize) करे। उनकी सेवा सुरक्षा की गारंटी देना सरकार का पहला दायित्व है।
अनुभव को मिले प्राथमिकता: वर्षों की सेवा और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर हमें सीधे समायोजित किया जाए।
कार्यरत शिक्षकों को सुरक्षित करने के बाद, भविष्य में आने वाली नई रिक्तियों या नई नियुक्तियों के लिए सरकार परीक्षा या साक्षात्कार का जो भी प्रारूप तय करना चाहती है, करने के लिए स्वतंत्र है।
“हम राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के हर कदम के साथ हैं, लेकिन अपनी बलि देकर नहीं। अबुआ सरकार को सबसे पहले हमारी शिक्षा योग्यता और वर्षों के लंबे अनुभव का सम्मान करते हुए हमें नियमित करना चाहिए। इसके बाद ही परीक्षा या साक्षात्कार के माध्यम से नई नियुक्तियों पर विचार हो।
