
रांची: झारखंड के विभिन्न आदिवासी संगठनों और आदिवासी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर परिसीमन के नाम पर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में संभावित कटौती का कड़ा विरोध किया है। संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों से किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि पिछले 75 वर्षों से पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत आदिवासियों को मिले अधिकारों की लगातार अनदेखी की गई है। उनका आरोप है कि CNT (छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट) और SPT (संथाल परगना टेनेंसी एक्ट) का बार-बार उल्लंघन हुआ है। विकास परियोजनाओं के नाम पर लाखों आदिवासियों को विस्थापित किया गया। उनका कहना है कि जब तक इन मामलों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक परिसीमन की कोई भी प्रक्रिया आदिवासी हितों के खिलाफ नहीं होनी चाहिए।
पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करने की मांग
संगठनों का कहना है कि पांचवीं अनुसूची राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष अधिकार देती है। इनमें आदिवासी जमीन की सुरक्षा, भूमि हस्तांतरण पर रोक और गैर-आदिवासियों के प्रवेश को नियंत्रित करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। लेकिन उनका आरोप है कि दशकों से इन संवैधानिक प्रावधानों का प्रभावी पालन नहीं हुआ। प्रेस वार्ता में कहा गया कि झारखंड में CNT और SPT एक्ट का खुलेआम उल्लंघन हुआ। फर्जी दस्तावेजों, अवैध कब्जों और प्रशासन की कथित मिलीभगत से लाखों एकड़ आदिवासी जमीन पर कब्जा किया गया। संगठनों ने यह भी दावा किया कि वर्ष 1951 से 1960 के बीच विकास परियोजनाओं के कारण करीब 85 लाख आदिवासी विस्थापित हुए, जो कुल विस्थापितों का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा था, जबकि देश की कुल आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी केवल 8.6 प्रतिशत है। उनका यह भी कहना है कि PESA Act, 1996 और Forest Rights Act (FRA), 2006 जैसे कानून भी पूरी तरह लागू नहीं हो सके और ग्राम सभाओं की सहमति की अनदेखी होती रही।
परिसीमन को लेकर क्या है आपत्ति?
आदिवासी संगठनों का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर यदि एसटी आरक्षित सीटों में कटौती की जाती है तो यह आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा। उनका आरोप है कि वर्षों से हुए विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण आदिवासी आबादी प्रभावित हुई है। ऐसे में पहले इन मामलों की जांच और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए, उसके बाद ही परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़े।
आदिवासी संगठनों की प्रमुख मांगें
परिसीमन के दौरान एसटी आरक्षित सीटों में किसी भी तरह की कटौती नहीं की जाए। पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में सीटें बढ़ाई जाएं और मौजूदा आदिवासी सीटों को फ्रीज किया जाए। CNT और SPT एक्ट का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में गैर-आदिवासियों की नई बसावट पर रोक लगाई जाए। राज्यपाल संविधान से मिले विशेष अधिकारों का पूर्ण उपयोग करें। पिछले 75 वर्षों में हुए विस्थापन, भूमि लूट और सांस्कृतिक नुकसान की जांच के लिए संसदीय समिति और न्यायिक आयोग का गठन किया जाए। साथ ही प्रभावित लोगों को मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी दी जाए।
30 अगस्त को रांची में महारैली का आह्वान
आदिवासी संगठनों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने 30 अगस्त 2026, रविवार को दोपहर 12 बजे रांची के मोरहाबादी मैदान में ‘आदिवासी एकता महाजुटान महारैली‘ आयोजित करने का ऐलान किया है। उन्होंने अधिक से अधिक लोगों से इसमें शामिल होने की अपील की है। संगठनों का कहना है कि यह रैली केवल आरक्षित सीटों की रक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की जमीन, संस्कृति, पहचान और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई भी है। उन्होंने आदिवासी समाज से पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू कराने, CNT-SPT एक्ट का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने और ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने के लिए एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की।

