


जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की विशेष अदालत ने 2013 के झीरम घाटी माओवादी हमले के मामले में सभी 10 आरोपियों को शनिवार को दोषी ठहराया। इस हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं समेत 29 लोगों की मौत हुई थी।





बचाव पक्ष के अधिवक्ता अरविंद चौधरी ने बताया कि जगदलपुर में एनआईए के विशेष न्यायाधीश अजय सिंह राजपूत की अदालत ने दो महिलाओं समेत सभी 10 आरोपियों को दोषी करार दिया।
उन्होंने बताया कि अदालत ने सजा की अवधि पर आदेश 16 सितंबर के लिए सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए।
दोषी ठहराए गए आरोपियों में प्रमिला मोदियाम (40), चैतू लेकाम, सुमित्रा पुनेम मोदियाम, मुक्का मंडावी, कोसा कवासी, आयता मरकाम, मडकामी देवा, जोगा मडकामी, बंजामी सन्ना और महादेव नाग शामिल हैं।
चौधरी ने कहा, “हम इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेंगे। हमें अभी तक फैसले की प्रति नहीं मिली है। इसके बाद ही अपील के आधार के बारे में बता पाएंगे।”
उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष ने अपना पक्ष मजबूती से रखा और उम्मीद है कि आरोपियों को उच्च न्यायालय से न्याय मिलेगा।
चौधरी ने बताया कि इस मामले में गिरफ्तार 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी, जिनमें से एक की सुनवाई के दौरान मौत हो गई।
दोषी ठहराए गए कोसा कवासी के भाई गुड्डू कवासी ने दावा किया कि उनके भाई और मुक्का मंडावी को इस मामले में झूठा फंसाया गया है।
उन्होंने दावा किया कि जब हमला हुआ, तब कोसा कवासी परिवार में एक शादी समारोह की तैयारी में लगे थे, जबकि मंडावी भी गांव में शादी की तैयारियों में व्यस्त थे।
गुड्डू ने कहा, “वे हमले के समय वहां मौजूद नहीं थे। जो लोग इसमें शामिल थे, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और आजादी से रह रहे हैं, जबकि जो लोग शामिल नहीं थे, वे सजा भुगत रहे हैं। परिवार के लोग टूट चुके हैं।”
यह हमला 25 मई 2013 को हुआ था, जब माओवादियों ने बस्तर जिले के दरभा पुलिस थाना इलाके के अंतर्गत झीरम घाटी में एक राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांग्रेस की “परिवर्तन यात्रा” पर घात लगाकर हमला किया था।
इस हमले में कांग्रेस नेताओं, आम लोगों और 10 सुरक्षाकर्मियों समेत कम से कम 29 लोग मारे गए थे और 30 से अधिक लोग घायल हुए थे।
मारे गए लोगों में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल और वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक उदय मुदलियार शामिल थे।
यह रैली उस साल के आखिर में होने वाले छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों से पहले आयोजित की गई थी।
घटना के बाद राज्य की पुलिस ने मामला दर्ज किया था, लेकिन रमन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन भाजपा सरकार ने हमले के दो दिन के अंदर जांच एनआईए को सौंप दी थी।
राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग भी बनाया था।
एनआईए ने 25 सितंबर 2014 को जगदलपुर की एनआईए की विशेष अदालत में गिरफ्तार नौ आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। 28 सितंबर 2015 को उसने 35 आरोपियों के खिलाफ पूरक आरोप-पत्र दाखिल किया, जिनमें से दो आरोपियों को बाद में गिरफ्तार किया गया था।
अधिकारियों ने बताया कि एनआईए द्वारा फरार घोषित किए गए कुछ आरोपियों ने बाद में मुख्यधारा में शामिल होने के लिए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
जनवरी 2019 में, भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हमले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया। सरकार का कहना था कि एनआईए ने हमले के पीछे की बड़ी साजिश की जांच नहीं की थी।
इसके बाद, 25 मई 2020 को पुलिस ने दरभा पुलिस थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 120 ब (आपराधिक साजिश) के तहत एक नयी प्राथमिकी दर्ज की। यह प्राथमिकी हमले में मारे गए कांग्रेस नेता उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार की शिकायत पर दर्ज की गई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि साजिश रचने वाले अभी भी फरार हैं और एनआईए की जांच में साजिश के पहलू को शामिल नहीं किया गया था।
एनआईए ने नए सिरे से जांच के लिए 16 जून 2020 को विशेष अदालत में अर्जी दी।
अदालत ने इस अर्जी को खारिज कर दिया। बाद में एजेंसी ने मामला मामले की जांच उसे सौंपने के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, लेकिन न्यायालय ने दखल देने से इनकार कर दिया।
तब से यह छत्तीसगढ़ में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री बघेल बार-बार आरोप लगाते रहे हैं कि हमले के पीछे की बड़ी साजिश की जांच नहीं की गई।
बघेल ने यह आरोप भी लगाया था कि साजिश के सिलसिले में एनआईए की प्राथमिकी में शुरुआत में माओवादी नेताओं गणपति और रमन्ना के नाम शामिल थे, लेकिन आरोप पत्र में उनके नाम नहीं थे।
पार्टी ने यह आरोप भी लगाया था कि 2014 में केंद्र में राजग सरकार बनने के बाद एनआईए की जांच की रफ़्तार धीमी पड़ गई थी।
इस बीच, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार ने छह नवंबर, 2021 को तत्कालीन राज्यपाल अनुसुइया उइके को झीरम घाटी जांच आयोग की रिपोर्ट सौंपी।
उस समय मुख्यमंत्री रहे बघेल ने बाद में राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपने के तरीके पर सवाल उठाए और कहा कि राज्य सरकार को राजभवन से कोई जानकारी नहीं मिली थी।
बाद में कांग्रेस सरकार ने एक नए अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति करके न्यायिक आयोग का पुनर्गठन किया और उसका कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया।
इसके बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पुनर्गठित आयोग की कार्यवाही पर रोक लगा दी, क्योंकि 2013 के हमले की जांच के लिए इसके अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया गया था। यह रोक भाजपा के वरिष्ठ विधायक और तत्कालीन विपक्ष के नेता धर्म लाल कौशिक द्वारा दायर एक पीआईएल पर सुनवाई के दौरान लगाई गई थी।
