आदिवासियों-मूलवासियों की संवैधानिक रक्षा का कवच है पांचवीं अनुसूची : महुआ माझी

महुआ माझी ने पांचवीं अनुसूची को आदिवासियों और मूलवासियों के संवैधानिक अधिकारों का सुरक्षा कवच बताया। रांची में सुधीर पाल की चार पुस्तकों के लोकार्पण पर जनजातीय अधिकारों और पेसा पर चर्चा हुई।

Archana Ekka
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रांची : राज्य सभा सांसद महुआ माझी ने कहा कि अब समय आ गया है कि पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र को केवल कानून के दायरे में न देखकर, उसे इतिहास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बहुआयामी त्रिकोण से देखा जाए। यहां संविधान और कानून से पहले परंपरा का शासन है, जहां आधुनिक प्रशासन से पहले समुदाय की सत्ता है, और जहाँ औद्योगिक ‘विकास’ से पहले सह-अस्तित्व की संस्कृति पलती है।

वह शनिवार को रांची प्रेस क्लब सभागार में जनवादी लेखक संघ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में लेखक सुधीर पाल की पांचवीं अनुसूची, पेसा और जनजातीय अधिकारों से संबंधित चार पुस्तकों के लोकार्पण के अवसर पर बोल रहीं थीं। उन्होंने सुधीर पाल के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनकी किताबें झारखंड जैसे विशिष्ट राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और सरोकार की राजनीति को नई दिशा देने में सहायक साबित होगी।

इस मौके पर इतिहास के सेवानिवृत प्राध्यापक और लेखक डॉ एल एन राणा ने कहा कि ये किताबें झारखंड के इतिहास, समाज, समुदाय और उनके संघर्षों को बेहतर ढंग से समझने में मददगार है। इन किताबों को पढ़ते हुए आप औपनिवेशिक राजनीति को बेहतर समझ पाएंगे। किताब में सुधीर पाल ने मनोयोग से बताया है कि समय, राजनीति और आर्थिक स्वार्थ की गठबंधन ने इस क्षेत्र को अपने क़ैदखाने में तब्दील कर दिया है। वरिष्ठ साहित्यकार और कवि कुमार बृजेन्द्र ने सत्र की अध्यक्षता करते हुए इन किताबों को आज के समय की जरूरत बताया। कार्यक्रम का संचालन अपराजिता ने किया।

‘झारखंड में पेसा: परंपरा, पंचायत और जवाबदेही’ पुस्तक पर चर्चा करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका दयामनी बारला ने कहा कि राज्य में पेसा लागू होने के बाद संसाधनों पर मालिकाना और प्रबंधन की लड़ाई को बल मिला है। यह किताब ग्राम सभा की सर्वोच्चता को आदिवासी इलाकों में सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में स्थापित करता है। नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी के व्याख्याता रामचन्द्र उरांव ने कहा कि किताब में बार-बार यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा बनाम आधुनिकता का नहीं है, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता बनाम सामुदायिक स्वशासन का है। यह टकराव उस विकास मॉडल का है, जो स्थानीय समाज को साझेदार नहीं, बाधा मानता है। वहीं, सत्र की अध्यक्षता करते हुए लेखिका डॉ किरण ने कहा कि पेसा को जानने और समझने का यह एक प्रामाणिक दस्तावेज है। संचालन आलम आरा ने किया।

‘पाँचवीं अनुसूची: परंपराओं का गणराज्य’ पर चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन सुधीर पाल की किताब पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र को केवल कानून के दायरे में न देखकर, उसे इतिहास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बहुआयामी त्रिकोण से देखने का नजरिया विकसित करती है। साहित्यकार रणेंद्र ने कहा कि यह किताब किस्से-कहानियों के माध्यम से उन जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराता है जहां संविधान और कानून को राजनीति और कॉर्पोरेट की गठजोड़ से केवल दिखावे का जरिया बना दिया गया है। डॉ जे पी गुप्ता ने कहा कि बिडम्बना है कि आम आदमी के लिए सात दशक के बाद भी पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र को समग्रता में जानने -समझने के लिए कोई किताब उपलब्ध नहीं थी, यह किताब उस कमी को पीरा करती है। इस सत्र का संचालन श्री अशरफ ने किया।

‘आंतरिक उपनिवेश और आदिवासी प्रश्न’ किताब पर चर्चा करते हुए साहित्यकार महादेव टोप्पो ने कहा कि संकलित लेखों में बार-बार यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा बनाम आधुनिकता का नहीं है, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता बनाम सामुदायिक स्वशासन का है। यह टकराव उस विकास मॉडल का है, जो स्थानीय समाज को साझेदार नहीं, बाधा मानता है। उन्होंने शासन की भाषा क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा में किए जाने की वकालत की। शिक्षविद और लेखक डॉ मिथिलेश ने कहा कि आंतरिक उपनिवेशवाद उस व्यवस्था की कहानी है, जिसमें राष्ट्र-राज्य अपने ही नागरिकों के एक बड़े हिस्से के साथ उपनिवेश जैसा व्यवहार करता है। उपनिवेशवाद से पहले दानवीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। अध्यक्षता करते हुए डॉ विनोद कुमार ने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता को हटाने की जरूरत है। इस सत्र का संचालन यासमीन लाल ने किया।

इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में आधे दर्जन से ज्यादा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के कवियों ने जन सरोकार से जुड़े विषयओं पर रचनाएं सुनाई। डॉ अशरफ अली, प्रियंका उरांव, यासमीन लाल, सत्यनारायण मुंडा, सालों उरांव, दिव्या मुर्मू, रीता सोरेंगे, महावीर उरांव, मनीषा बोदरा, तथा शिवशंकर उरांव ने कविताएं पढ़ी। इस सत्र का संचालन विकी मिंज और सुकेशी कर्मकार ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में जनवादी लेखक संघ के एम जेड खान, आलम आरा, यासमीन लाल, सुकेशी कर्मकार और विक्की मिंज समेत अन्य की भूमिका रही।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सन्मार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।