
Major Decision in wife Murder case: झारखंड हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या (Murder) से जुड़े एक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाया है।
अदालत ने हजारीबाग की निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा को रद्द कर दिया।
इसके साथ ही दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। यह फैसला लंबे समय से चल रहे इस मामले में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
इस मामले में Trial Court ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
निचली अदालत का मानना था कि आरोपियों ने मिलकर हत्या की घटना को अंजाम दिया है। इसी फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी।
वैवाहिक तनाव को हत्या का कारण मानने से इनकार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि केवल वैवाहिक तनाव को हत्या का ठोस कारण नहीं माना जा सकता।
मृतका के माता-पिता द्वारा बताए गए वैवाहिक विवाद को भी अदालत ने हत्या की पुख्ता वजह मानने से इनकार कर दिया। अदालत का कहना था कि इस आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
सबूतों की कमी पर उठे सवाल
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सह-अभियुक्त धनु भुइयां के खिलाफ केवल कथित स्वीकारोक्ति बयान के अलावा कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है।
जिस चाकू की बरामदगी दिखाई गई थी, उसे न तो फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया और न ही यह साबित हो पाया कि उसी हथियार से हत्या की गई थी। ऐसे में अभियोजन पक्ष की कहानी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं मानी गई।
प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं होने का असर
High Court ने अपने फैसले में यह भी कहा कि इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है।
पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, जो अदालत की नजर में पूरी तरह मजबूत नहीं पाए गए। इसी कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा।
2000 का है मामला, 2003 में आया था फैसला
यह मामला वर्ष 2000 का है, जिसमें शत्रुघ्न प्रसाद डांगी की पत्नी उपा देवी की हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में इसे लूट और हत्या का मामला बताया गया था।
बाद में जांच के दौरान पति पर ही साजिश रचकर हत्या कराने का आरोप लगाया गया और धनु भुइयां को सह-अभियुक्त बनाया गया। वर्ष 2003 में निचली अदालत ने दोनों को दोषी ठहराया था।
जमानत बंधन से भी मिली मुक्ति
चूंकि दोनों आरोपी अपील के दौरान जमानत पर थे, इसलिए High Court ने उन्हें जमानत बंधन से भी मुक्त कर दिया। अदालत के इस फैसले के बाद वर्षों से चल रहे इस मामले का अंत हो गया।
न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल और सीख
इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि गंभीर मामलों में ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्य कितने जरूरी होते हैं। बिना पुख्ता सबूत के किसी को दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना गया है।

