


सुशोभित





इधर मध्यप्रदेश में नर्मदा-परिक्रमा की एक वरेण्य-परम्परा रही है। कोई 3500 किलोमीटर लम्बी पैदल-प्रदक्षिणा में 3 साल, 3 महीने, 13 दिन लगते हैं। किन्तु हर कोई तो परिव्राजक-जंगम नहीं होता, जो अखण्ड-परिक्रमा कर सके। तो बहुतेरे जन खण्ड-परिक्रमा भी करते हैं। कि एक बार में जबलपुर से मण्डला तक चले गए। फिर मण्डला से अमरकंटक तक चले गए। उधर से लौटते हुए रुक-रुककर डिंडौरी, बरमानघाट, नर्मदापुरम, ओंकारेश्वर होते हुए चले। उत्तर-तट पर चलने वाला प्राय: उद्गम तक यात्रा करता है, दक्षिण-तट पर चलने वाला सागर-संगम तक जाता है। ‘परकम्मावासी’ कभी नदी को लाँघते नहीं हैं। नर्मदा की नहरों-बाँधों को अवश्य इस नियम से छूट दे दी जाती है। अमरकंटक तरफ़ जहाँ युवा-नर्मदा की धार तन्वंगी और क्षीण होती है, वहाँ विशेष सावधानी बरती जाती है कि कहीं कोई उपधारा समझकर नर्मदा को ही ना लाँघ जावें। अन्यथा परिक्रमा खण्डित हो जावेगी!
यह महान-परम्परा कब और कैसे शुरू हुई, कौन जाने, किन्तु किसी और नदी की ऐसे परिक्रमा नहीं की जाती, जैसे नर्मदा की होती है। तीर्थ में प्राय: देवस्थल होता है और नदी भी होती है। तीर्थ पर देवदर्शन सम्भव है किन्तु नदी को एक भूदृश्य में, एक दृष्टि से समूचा अवलोक पाना सम्भव नहीं। तीर्थ की प्रदक्षिणा भी सम्भव है, किन्तु नदी की प्रदक्षिणा उद्गम से संगम तक उसकी धारा को एक बार भी लाँघे बिना नहीं हो सकती। नदी अपने स्वरूप में एक चुम्बकीय आकर्षण वाली, विचित्र, प्रलम्बित-खिंची हुई संरचना होती है। वह जीवंत-तीर्थ होती है, प्राणऊर्जा से पूरित रहती है। विशेषकर नर्मदा जैसी शक्तिशाली नदी, जो प्राय: मैदानों में नहीं, वन-अरण्यों में बहती है और पर्वतों-शिलाओं को काटती-छाँटती चलती है।
नर्मदा-पथ में पूरे समय आपको इस महान नदी की अदम्य शक्ति का अनुभव होता है। आप देखते हैं कि लाखों वर्षों से बह रही इस नदी ने कैसे पर्वतों को काटकर उनके बीच से अपना रास्ता बनाया है, जबकि उसके पास मुड़ने का विकल्प भी था। जबलपुर के निकट नर्मदा पहले धुआँधार से उत्तर दिशा में मुड़कर आगे बह जाती थी- वहाँ उसका पुराना पाट भी मौजूद है- किन्तु वह भेड़ाघाट की धवल-शिलाओं को काटते हुए नया रास्ता बनाती है। ओंकारेश्वर में मान्धाता पर्वत की तराश पर नर्मदा के आवेग के चिह्न हैं। यह बहुत वेगवान और बलशाली नदी है। बहुत प्राक्तन भी है। कहते हैं गंगा श्रेष्ठ है, किन्तु नर्मदा ज्येष्ठ है।
मेरे नगर भोपाल से नर्मदा अधिक दूर नहीं है। कोई दो घंटे की ड्राइव में बुदनी घाट आ जाता है। आगे नर्मदा-तवा संगम है। नर्मदा के उत्तर-तट पर बुदनी और दक्षिण-तट पर नर्मदापुरम (पहले का नाम होशंगाबाद) बसे हैं। मध्यप्रदेश से दक्षिण-दिशा की कोई भी यात्रा नर्मदा को लाँघे बिना सम्भव नहीं। पहले हम इन्दौर से चलते थे तो नेमावर-बड़वानी में नर्मदा लाँघते ही थे। बड़वाह से सनावद जाएँ तो बीच में नर्मदा हैं। ओंकारेश्वर-महेश्वर जाएँ तो पहले मोरटक्का में भी नर्मदा हैं। किन्तु रेल-मोटर से नर्मदा के दर्शन करना एक बात है और आकाश-वृत्ति से उसकी पैदल-परिक्रमा दूसरी बात है। परकम्मावासी साथ में आटा-दाल लिए अवश्य चलते हैं किन्तु रात कहाँ रुकेंगे, इसका ठिकाना नहीं होता। कभी किसी स्कूल, कभी किसी मंदिर, कभी धर्मशाला, कभी किसी के घर में ठहर जाते हैं। अगली सुबह फिर चल पड़ते हैं। पूरे यात्रा-पथ में उन्हें नर्मदा की संस्कृति के दर्शन होते हैं। कई तटों पर तीर्थ हैं। मेले भरते हैं। नगर-क़स्बे पोषित होते हैं। विन्ध्य और सतपुड़ा की पर्वत-शृंखलाओं के बीच की घाटी में बहने वाली नर्मदा मध्यप्रदेश का प्राण है। वह भारत के हृदयप्रदेश की गंगा है।
नर्मदायात्री श्री अमृतलाल वेगड़ ने साहित्य में अपने वृत्तान्त से नर्मदा-परिक्रमा को अमर कर दिया है। जीवन में कभी अवसर मिला और शक्ति रही तो खण्ड-परिक्रमा ही सही, किन्तु नर्मदा की धारा के साथ-साथ कभी अवश्य चलूँगा!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
