मुख्यमंत्री बनने के लिए राजभवन रिक्शे से पहुंचे थे राम नरेश यादव

1977 में राम नरेश यादव का साधारण सांसद से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना, रिक्शे से राजभवन पहुंचना और सादगीपूर्ण जीवन भारतीय राजनीति की सबसे प्रेरक ऐतिहासिक कहानी है आज

11 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

भारतीय राजनीति में सत्ता का मतलब अक्सर लालबत्ती, सुरक्षा का बड़ा काफिला और सरकारी शानो-शौकत माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मुख्यमंत्री के बारे में सुना है, जो मुख्यमंत्री बनने के लिए राजभवन रिक्शे से पहुंचे हों और पद छोड़ने के बाद भी बिना किसी तामझाम के उसी रिक्शे से अपने घर लौट गए हों? यह कोई लोककथा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव की सच्ची कहानी है। यह कहानी केवल एक नेता की नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति, सादगी और जनसेवा की भी मिसाल है। आइए OLDISGOLDFILMS पर जानते हैं उस नेता की पूरी कहानी, जिसने सत्ता को कभी अपने सिर पर नहीं चढ़ने दिया।

एक साधारण आवेदन पत्र… और अचानक बदल गई पूरी किस्मत!

साल 1977 भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। आपातकाल समाप्त हो चुका था। जनता पार्टी सत्ता में आ चुकी थी और पूरे देश में नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो रही थी। उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य नए मुख्यमंत्री की तलाश में था। पार्टी के भीतर कई बड़े नेताओं के नाम चल रहे थे। हर गुट अपने उम्मीदवार को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था। ऐसे समय में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आजमगढ़ का एक शांत स्वभाव वाला सांसद अचानक पूरे प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया जाएगा।

दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और समाजवादी नेता राजनारायण अपने कार्यालय में बैठे थे। तभी सांसद राम नरेश यादव उनसे मिलने पहुंचे। वे किसी बड़े राजनीतिक पद की मांग लेकर नहीं आए थे। उनके हाथ में अपने क्षेत्र में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुलवाने का साधारण आवेदन पत्र था। लेकिन कहते हैं कि इतिहास कभी-कभी बिल्कुल साधारण क्षणों में करवट लेता है। जैसे ही राजनारायण ने उन्हें देखा, उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। मानो उन्हें अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या का समाधान मिल गया हो। उसी क्षण उन्होंने तय कर लिया कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री यही व्यक्ति होगा।

जब मुख्यमंत्री का नाम किसी को नहीं पता था… यहां तक कि उन्हें खुद भी नहीं!

उस समय मुख्यमंत्री के नाम को लेकर इतना गोपनीय माहौल था कि पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं को भी अंतिम निर्णय की जानकारी नहीं थी। राजनारायण सीधे जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर के घर पहुंचे और उत्साहित होकर बोले— “अध्यक्ष जी, आपकी समस्या का समाधान मिल गया।” इसके बाद दोनों नेता प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से मिलने गए। लंबी चर्चा हुई। रात गहराने लगी। जब वे वापस लौटे तो लगभग रात के नौ बज चुके थे। तभी राम नरेश यादव को पहली बार बताया गया कि उत्तर प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री वही बनने जा रहे हैं। उनके लिए यह किसी सपने से कम नहीं था। वे न तो इसकी तैयारी करके आए थे और न ही उन्हें किसी राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा बनाया गया था। उनका चयन उनके शांत व्यक्तित्व, ईमानदारी और स्वीकार्यता के कारण हुआ था।

एक बंद लिफाफा… और सिर्फ एक निर्देश जिसने सबको चौंका दिया

मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद भी किसी प्रकार का उत्सव नहीं मनाया गया। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, न कोई सार्वजनिक घोषणा। उन्हें तत्काल वीवीआईपी कोटे से रेल का टिकट दिया गया। हाथ में एक सीलबंद लिफाफा पकड़ा दिया गया और केवल इतना कहा गया कि सुबह लखनऊ पहुंचकर सीधे राजभवन जाइए और यह लिफाफा राज्यपाल को सौंप दीजिए। साथ ही सख्त निर्देश दिया गया कि जब तक राज्यपाल से मुलाकात न हो जाए, किसी को भी इस निर्णय की जानकारी नहीं दी जाएगी। कल्पना कीजिए, जिस व्यक्ति को अगले ही कुछ घंटों में देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक का मुख्यमंत्री बनना था, वह पूरी रात एक सामान्य यात्री की तरह ट्रेन में सफर कर रहा था। न सुरक्षा, न सरकारी सुविधा और न ही किसी तरह का विशेष इंतजाम। शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।

जब पूरे प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री रिक्शे पर बैठा था… और दुनिया को इसकी भनक लग गई!

सुबह जब राम नरेश यादव लखनऊ मेल से चारबाग स्टेशन उतरे तो उन्होंने किसी सरकारी गाड़ी की मांग नहीं की। वे स्टेशन से बाहर निकले और एक साधारण रिक्शा कर लिया। रिक्शा धीरे-धीरे राजभवन की ओर बढ़ रहा था। तभी रास्ते में आकाशवाणी की एक एंबेसडर कार ने उनका रिक्शा रोक लिया। कार से उतरे अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहुत-बहुत बधाई हो मुख्यमंत्री जी।” राम नरेश यादव स्वयं चौंक गए। उन्होंने धीरे से पूछा, “आपको कैसे पता? मुझे तो कहा गया था कि किसी को कुछ नहीं बताना है।” तब अधिकारी ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वे आकाशवाणी लखनऊ के समाचार निदेशक मुन्नीलाल हैं और उन्हें दिल्ली के सूत्रों से यह सूचना मिल चुकी है। उन्होंने आग्रह किया कि वे कार में बैठकर राजभवन चलें, लेकिन राम नरेश यादव ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे उसी रिक्शे से जाएंगे, जिससे निकले हैं। यही वह क्षण था जिसने उन्हें आम जनता के दिलों में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

आकाशवाणी की एक खबर… और पूरे देश में मच गया राजनीतिक भूचाल

सुबह आठ बजे आकाशवाणी लखनऊ के समाचार बुलेटिन में एक ऐसी खबर प्रसारित हुई जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। समाचार में बताया गया कि जो साधारण व्यक्ति अभी कुछ देर पहले रिक्शे पर बैठकर राजभवन गया है, वही उत्तर प्रदेश का नया मुख्यमंत्री बनने वाला है। यह समाचार कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय प्रसारण का हिस्सा बन गया। बीबीसी लंदन सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों ने भी इस घटना को प्रमुखता से प्रकाशित किया। लखनऊ प्रशासन अचानक सक्रिय हो गया। सुरक्षा एजेंसियां उस रिक्शे की तलाश करने लगीं। मीडिया कार्यालयों में फोन लगातार बजने लगे। लेकिन जब तक पूरा प्रशासन सक्रिय होता, वह साधारण रिक्शा राजभवन पहुंच चुका था। उसी शाम राम नरेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

सिर्फ मुख्यमंत्री बनने में ही नहीं… इस्तीफा देने में भी दिखाई वही सादगी

अक्सर देखा जाता है कि सत्ता छोड़ते समय नेता आखिरी क्षण तक सरकारी सुविधाओं का उपयोग करते हैं। लेकिन राम नरेश यादव इससे बिल्कुल अलग थे। वर्ष 1979 में जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, तब भी उन्होंने वही सादगी दिखाई जिसने उन्हें जनता का प्रिय बनाया था। राजभवन में इस्तीफा सौंपने के बाद उन्होंने किसी सरकारी वाहन की मांग नहीं की। वे फिर एक साधारण रिक्शे पर बैठे और उसी रिक्शे से अपने घर लौट गए। शायद भारतीय राजनीति में यह घटना आज भी अद्वितीय है। यह केवल दिखावा नहीं था, बल्कि उनके जीवन का स्वभाव था। कहा जाता था कि वे हमेशा अपनी जेब में इस्तीफे का पत्र रखते थे, क्योंकि उनके लिए पद से बड़ा सिद्धांत था।

आखिर क्यों चुने गए राम नरेश यादव? इसके पीछे छिपी थी बड़ी राजनीतिक रणनीति

राम नरेश यादव का मुख्यमंत्री बनना केवल संयोग नहीं था। उस समय उत्तर प्रदेश में यादव राजनीति तेजी से बदल रही थी। एक ओर राम नरेश यादव स्थापित नेता थे, तो दूसरी ओर मुलायम सिंह यादव तेजी से उभर रहे थे। पार्टी के भीतर कई गुट सक्रिय थे और मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबी खींचतान चल रही थी। तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह का मानना था कि राम नरेश यादव का शांत स्वभाव, प्रशासनिक समझ और संतुलित व्यक्तित्व उन्हें इस पद के लिए अधिक उपयुक्त बनाता है। यही कारण था कि अंततः उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया। बाद में उन्होंने बाबू बनारसी दास सरकार में उपमुख्यमंत्री, राज्यसभा में उपनेता, मध्य प्रदेश के राज्यपाल और छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त प्रभार वाले राज्यपाल के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। हालांकि उनके सार्वजनिक जीवन के अंतिम वर्षों में व्यापम प्रकरण से जुड़े आरोप भी सामने आए, जिनकी कानूनी प्रक्रिया अलग विषय रही। फिर भी भारतीय राजनीति में उनकी पहचान सबसे अधिक उनकी असाधारण सादगी और विनम्रता के लिए ही याद की जाती है।

आज भी क्यों याद की जाती है यह रिक्शे वाली कहानी?

आज जब राजनीति में सत्ता का प्रदर्शन अक्सर चर्चा का विषय बनता है, तब राम नरेश यादव की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जननेता की पहचान उसके काफिले से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है। रिक्शे पर मुख्यमंत्री बनकर जाना और उसी रिक्शे से पद छोड़कर लौट आना केवल एक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस दौर का प्रतीक है, जब सादगी भी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी। शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी यह किस्सा इतिहास के पन्नों में जीवित है। यह कहानी हमें बताती है कि बड़े पद इंसान को बड़ा नहीं बनाते, बल्कि इंसान का चरित्र उस पद की गरिमा बढ़ाता है।

Share This Article
विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।