
सुशोभित
एक मित्र ने पूछा है कि अवसाद में हूँ और आत्मघात करना चाहता हूँ, क्या आप मुझे कोई आश्वासन दे सकते हैं?
मुझे पता नहीं, उन्होंने मुझे इस प्रश्न के समाधान के योग्य क्यों समझा, किन्तु उन्हें कहा है कि आत्मघात के विचार में बुराई नहीं, बशर्ते हमें ठीक-ठीक पता हो कि मृत्यु के बाद क्या होगा। उसके बिना यह बात बेतुकी है। क्योंकि अगर आप जीवन से तंग आकर इसका अंत कर देना चाहते हैं, किन्तु आत्मघात के बाद आप जानें कि शरीर तो नष्ट हो गया किन्तु जीवन निरन्तर है, तब क्या करेंगे? प्रश्न यह है कि दु:ख किसे होता है? दु:ख का अनुभोक्ता कौन है? यह जो विचार, स्मृति, कल्पना, अनुभूति से निर्मित सेल्फ़ है- जो दु:ख भोग रहा है- आत्मघात के बाद भी अगर वह बचा रह गया तो? अगर उसे फिर से सब शुरू करना पड़ा और नई देह, नए जीवन में उसने प्रवेश किया भी तो उसी विषाद-चेतना का संस्कार लेकर, तो अंतर ही क्या पड़ा? नाहक समय ही तो व्यर्थ हुआ।
मित्र से कहा है कि याद रखें यह विचार तो मनुष्य को त्रास देता ही है कि देह के साथ जीवन भी नष्ट हो जाएगा, यह विचार भी कम दुर्द्धर्ष नहीं कि मृत्यु के बाद देह नष्ट होगी किन्तु मैं बचा रह जाऊँगा। उस स्थिति में अगर मैं आज अवसाद में हूँ तो क्या मृत्यु इस यथास्थिति को बदल सकेगी? मृत्यु के बाद क्या होगा, यह ठीक-ठीक जाने बिना यह अज्ञात में छलाँग ही होगी। तब क्या उपाय है?
मेरा अनुभव यह है कि दु:ख को भोगने के सिवा कोई चारा नहीं। शरीर में भी पीड़ा हो तो उसका पूर्ण भोग नियत है। शरीर के सुख भोगे तो दुःख भी भोगना है, सिक्के के साथ उसके दोनों पहलू आते हैं। यह परीक्षा देर-अबेर हर मनुष्य को देनी ही है- किसी को पहले, किसी को बाद में। क्योंकि मनुष्यता जैसी है, वह एक महान त्रासदी की ओर अंधगति से बढ़ने वाली वस्तु के सिवा कुछ नहीं। आघात सन्निकट है, किसी भी क्षण घट सकता है- क्योंकि जीवन के तमाम आलम्बन न केवल नश्वर, पार्थिव और अनित्य हैं, वे किन्हीं संयोगों से भी निर्मित हैं और उनके सूत्र हमारे हाथ में नहीं। स्वप्न देखना मृत्यु को पुकारना है क्योंकि स्वप्नभंग होगा। प्रेम करना नाश को पुकारना है क्योंकि प्रियजन का साथ छूटेगा। जीवन आपको रौंदकर आगे बढ़ जाएगा। आप विषाद से भरेंगे।
यह जो रेफ़रेंस पॉइंट ऑफ़ सेल्फ़ है, यह अनुभोक्ता- जो कहता है मैं अवसाद में हूँ, मैं विषाद में हूँ, मैं आत्मघात करना चाहता हूँ- इसके परीक्षण के सिवा कोई और समाधान नहीं। आप पूछ सकते हैं कि क्या परीक्षण सम्भव है भी? कौन किसका परीक्षण करेगा? क्या देह और चेतना में द्वैत है? देह तो भौतिक नियमों के अधीन है, किन्तु जिन सूक्ष्म चित्तबिंदुओं से यह चेतना बनी है, उसका क्या? मेरे पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं, क्योंकि मैं भी अन्वेषी हूँ, साधक हूँ। पर ऐसे कल्याणमित्र अवश्य हुए हैं, जिन्होंने इन प्रश्नों का उत्तर दिया है। अगर आपको उनसे राह मिलती हो तो उनके पास जाएँ- रमण हैं, कृष्णमूर्ति हैं, रजनीश हैं। सुदूर अतीत में कृष्ण हैं, बुद्ध हैं, महावीर हैं, अष्टावक्र हैं, शंकर हैं, लाओत्से हैं। इन सबों ने संकेत किया है। चेतना की यात्रा के बारे में सूत्र दिए हैं। उनमें अवगाहन करें।
जीवन- जिसे मैं जानता हूँ, भोगता हूँ, जीता हूँ- जब मैं का यह रेफ़रेंस पॉइंट न होगा, क्या तब भी होगा? राग-द्वेष होगा? सृष्टि होगी? अगर होगी तो वह जिस तरह से मेरे भीतर प्रतिबिम्बित होती है, मेरे न होने पर भी होगी? कहाँ प्रतिबिम्बित होगी? द्रष्टा के बिना दृश्य का तोरण कहाँ बँधेगा? सुख का अनुभव मैंने किया, दु:ख का किया। सपने मैंने बाँधे, सपने टूटे। मैं जीवित हूँ, मैं मरूँगा। यह मैं कौन है- जिसके बारे में पासपोर्ट और पहचान-पत्र मुकम्मल सूचनाएँ नहीं दे पाते?
मैं नहीं समझता हमारे पास इस छोटे-से जीवन में इसके सिवा कोई और विकल्प शेष है कि हम इस मैं का अन्वेषण-परीक्षण करें और इसकी तह तक जाएँ। समय अधिक नहीं है और गँवाने योग्य नहीं है। जीवन दु:ख देता है तो उसे सहने की सामर्थ्य भी जीवन से ही मिलती है।
उन मित्र से यही कहा है कि कर डालो आत्मघात, अगर पक्का पता हो कि मरकर मुक्त हो जाओगे! अगर नहीं पता है तो मुक्ति का मार्ग तलाशो। मैं भी खोज रहा हूँ!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

