
रांची: राजधानी रांची में मरीजों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। शहर में संचालित अधिकांश प्राइवेट अस्पताल, क्लीनिक, डेंटल क्लीनिक और डायग्नोस्टिक लैब अब भी फायर सेफ्टी मानकों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं। स्थिति यह है कि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड 1300 से अधिक स्वास्थ्य संस्थानों में से केवल 293 संस्थानों ने ही फायर सेफ्टी ऑडिट कराया है। ऐसे में किसी भी आपात स्थिति में मरीजों और उनके परिजनों की जान जोखिम में पड़ सकती है। बता दें कि मुजफ्फरपुर में एक हॉस्पिटल में आग लग गई। जिसमें 5 लोगों की जान चली गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि फायर सेफ्टी ऑडिट नहीं करने वाले अस्पतालों पर विभाग कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है।
स्वास्थ्य विभाग ने हॉस्पिटलों का फायर सेफ्टी ऑडिट कराने का दिया था निर्देश
स्वास्थ्य विभाग ने कुछ समय पहले सभी प्राइवेट अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को फायर सेफ्टी ऑडिट कराने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में संस्थानों ने अब तक ऑडिट नहीं कराया है। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज, ऑक्सीजन सिलेंडर, विद्युत उपकरण और अन्य ज्वलनशील सामग्री मौजूद रहती है। ऐसे में आग लगने की घटना होने पर स्थिति बेहद भयावह हो सकती है।
प्राइवेट अस्पतालों में अव्यवस्था
एक्सपर्ट्स के अनुसार अस्पतालों में फायर अलार्म सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, अग्निशमन यंत्र, स्मोक डिटेक्टर और कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण होना आवश्यक है। लेकिन कई छोटे और मध्यम स्तर के प्राइवेट अस्पतालों में इन व्यवस्थाओं का अभाव देखने को मिलता है। कई संस्थानों में अग्निशमन यंत्र तो लगाए गए हैं, लेकिन उनकी नियमित जांच और रखरखाव नहीं किया जाता।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत जरूरी है फायर एनओसी
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत किसी भी अस्पताल, क्लीनिक या लैब के रजिस्ट्रेशन के लिए फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इसके बावजूद कई संस्थान सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हुए संचालन कर रहे हैं। इससे मरीजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। हाल के दिनों में कुछ राज्यों के अस्पतालों में आग लगने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें कई मरीजों की मौत भी हुई है। इन घटनाओं के बाद अस्पतालों में फायर सेफ्टी को लेकर नियमों को और सख्त किया गया था। इसके बावजूद राजधानी में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संस्थानों का फायर सेफ्टी ऑडिट नहीं होना प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

