- सीटी स्कैन, इको और अल्ट्रासाउंड में मरीजों को मिल रही कई दिन के बाद की तारीख
- हॉस्पिटल में इलाज के लिए हर दिन पहुंच रहे हजारों लोग
- ओपीडी में आते हैं हर दिन 2 हजार मरीज, इमरजेंसी में इलाज के लिए भर्ती होते है 250 से अधिक मरीज
RIMS Ranchi : रिम्स में इलाज कराने आ रहे मरीजों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। हॉस्पिटल में जांच सुविधाओं पर दबाव इस कदर बढ़ गया है कि गंभीर मरीजों को भी सीटी स्कैन और इको (Echocardiography) जैसी जरूरी जांच के लिए 8-8 दिनों की लंबी वेटिंग मिल रही है।

आज परेशानी लेकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को एक हफ्ते बाद की तारीख दी जा रही है, जिससे उनके इलाज में देरी हो रही है। इतना ही
राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में चरमराई व्यवस्था
रिम्स झारखंड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, जहां न केवल रांची बल्कि आसपास के राज्यों से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। राज्य के कोने-कोने से लोग उम्मीद लेकर आते हैं। ऐसे में जब उन्हें टेस्ट के लिए लिखा जाता है तो उन्हें निराशा हाथ लगती है जब उन्हें टेस्ट के लिए 8 दिन के बाद का नंबर मिलता है।
ऐसे में कमजोर तबके के लोग इंतजार करते हैं जबकि कुछ लोग प्राइवेट में चार गुना अधिक तक पैसे देकर जांच कराते हैं। इससे आर्थिक रुपए से बोझ तो बढ़ता है वहीं मरीज को लेकर आने जाने में भी परेशानी होती है सो अलग।
ओपीडी में मरीजों का भारी दबाव
अस्पताल की ओपीडी में हर दिन औसतन 2,000 से अधिक मरीज परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं। वहीं रिम्स के इमरजेंसी वार्ड में प्रतिदिन 250 से ज्यादा गंभीर मरीज इलाज के लिए भर्ती किए जा रहे हैं। हर दिन पहुंचने वाले हजारों लोगों की वजह से अस्पताल के रिसोर्सेज और जांच मशीनों पर बोझ पड़ रहा है। इसके बावजूद प्रबंधन मरीज को समय से जांच उपलब्ध नहीं कर पा रहा है। और न ही संसाधन बढ़ाए जा रहे हैं।
जांच में देरी से बढ़ रहा है मरीजों का दर्द
सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड और इको जैसी जांच गंभीर बीमारियों का समय पर पता लगाने के लिए बेहद जरूरी होती हैं। डॉक्टरों को सटीक इलाज शुरू करने के लिए इन रिपोर्ट्स की तुरंत आवश्यकता होती है। लेकिन रिम्स में वर्तमान स्थिति यह है कि अगर कोई मरीज आज गंभीर स्थिति में पहुंचता है, तो उसे जांच के लिए 8 दिन बाद का समय दिया जा रहा है। अल्ट्रासाउंड में भी 5 दिन तक की वेटिंग से मरीज परेशान है।
इस वजह से दूर-दराज के गांवों से आने वाले गरीब मरीज इतने दिनों तक रांची में रुककर इंतजार करने को मजबूर हैं। जो सक्षम हैं, वे निजी सेंटरों में महंगी जांच कराने चले जाते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के पास इंतजार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।


