

नई दिल्ली : चुनावी शोर, सियासी नारों और रैलियों की गूंज के बीच पश्चिम बंगाल के एक प्राचीन मंदिर ने अचानक पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।





दरअसल, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में ठनठनिया काली मंदिर में पूजा-अर्चना की तो करीब 300 साल पुराना यह पावन धाम सुर्खियों में आ गया। इस मंदिर की सबसे बडी खासियत यहां चढ़ाया जाने वाला है। दरअसल, यहां मां काली की आराधना उनके ‘सिद्धेश्वरी’ स्वरूप में की जाती है, जो भक्तों के लिए शक्ति और संरक्षण का अद्वितीय संगम माना जाता है। ठनठनिया कालीबाड़ी मंदिर की खास परंपरा है कि यहां मां को आमिष (नॉन-वेज) का प्रसाद चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि रामकृ्ष्ण परमहंस ने केशब चंद्र सेन की अच्छी सेहत के लिए मां को ‘डाब-चिंगड़ी’ (नारियल और झींगा) का प्रसाद चढ़ाया था।
इसके बाद से यहां आमिष भोग की परंपरा शुरू हो गई। 1703 में स्थापित इस ‘जागृत’ मंदिर से भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाते। ऐसा भी कहा जाता है कि घने जंगल के बीच स्थित मंदिर में घंटियों की आवाज जोर-जोर से गूंजती है और उसी की ठन-ठन से यहां के इलाके का नाम ठनठनिया पड़ गया।
मंदिर से जुड़ीं मान्यताएं
पुरानी मान्यताओं के अनुसार, उदनारायण ब्रह्मचारी नामक तांत्रिक ने भागीरथी नदी के किनारे घने जंगलों में स्थित श्मशान में मां काली की सिद्धेश्वरी रूप की मूर्ति बनाई थी। फिर शंकर घोष नाम के व्यक्ति ने 1860 में यहां काली मंदिर और पुष्पेश्वर शिव का आठचाला मंदिर बनवा दिया। आज भी उनके वंशज इस मंदिर का सेवा करते हैं।
सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में स्थित मूर्ति मिट्टी का बनी है, जिसे हर साल पुनः संस्कार किया जाता है। यही नहीं, चतुर्भुजा और गहरे काले वर्ण वाली सिद्धेश्वरी देवी के बाएं हाथों में खड़्ग व नरकपाल सुशोभित हैं। यहां मां की पूजा तांत्रिक विधि से की जाती है।
हर अमावस्या को हजारों भक्त दर्शनों के लिए आते हैं
हर अमावस्या को यहां हजारों की संख्या में भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं। हालांकि ठनठनिया मंदिर रोजाना भक्तों के लिए खुला रहता है। श्रद्धालु किसी भी दिन सुबह 6 बजे से 11 बजे तक और दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक मां के दर्शन करने के लिए आ सकते हैं।
