रिम्स का 800 करोड़ का बजट, सुविधाएं देने में प्रबंधन फेल

Archana Ekka
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. लंबी कतारों से परेशान है मरीज, नहीं है मुक्कमल इंतजाम

.रिपोर्ट के लिए लगानी पड़ रही दौड़, फिर बाहर से टेस्ट करा रहे डॉक्टर

. हॉस्पिटल में हाइजीन का नहीं रखा जा रहा ख्याल

. पर्ची में लिखी दवाएं नहीं मिलती मरीजों को, बाहर में हो रहा खर्च

. इम्प्लांट भी खरीदकर लगाना पड़ रहा मरीजों को

रांची: राज्य के सबसे बड़े सरकारी हॉस्पिटल रिम्स में व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए 800 करोड़ रुपये का सालाना बजट है। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन मरीजों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल साबित हो रहा है। अस्पताल की अव्यवस्था और बदहाली के कारण हर दिन सैकड़ों मरीजों को मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

लंबी कतारें और चरमराई सफाई व्यवस्था
अस्पताल में सुबह से ही मरीजों की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। रजिस्ट्रेशन काउंटर से लेकर डॉक्टरों के केबिन के बाहर तक कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। न तो बैठने की उचित व्यवस्था है और न ही प्रबंधन इसे लेकर गंभीर। इसके अलावा, परिसर में जगह-जगह कचरा और गंदे शौचालय अस्पताल के गिरते हाइजीन स्तर की पोल खोल रहे हैं। इलाज कराने आ रहे लोग यहां के गंदगी भरे माहौल में ठीक होने की बजाय बीमार हो जाएंगे।

जांच के लिए कर रहे दौड़-भाग, बाहर से टेस्ट कराना मजबूरी

पैथोलॉजी विभाग की हालत भी कुछ अलग नहीं है। ब्लड और अन्य टेस्ट की रिपोर्ट हासिल करने के लिए मरीजों को कई-कई दिनों तक चक्कर काटने पड़ रहे हैं। हद तो तब हो जाती है जब अस्पताल में सुविधाएं होने के बाद भी मरीजों को बाहर के निजी सेंटरों से महंगे टेस्ट करवाना पड़ रहा हैं। चूंकि रिम्स की रिपोर्ट को डॉक्टर सही नहीं मान रहे। ये हम नहीं बल्कि मरीजों के परिजन कह रहे है। इस चक्कर में मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है।

न दवा मिल रही, न इम्प्लांट

अस्पताल के मेडिकल स्टोर से मरीजों को पर्ची में लिखी आधी दवाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। डिस्पेंसरी में भी गिनती की दवाएं है। मजबूरन गरीब मरीजों को बाहर की दुकानों से महंगे दामों पर दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। यही स्थिति रिम्स के कई विभागों की है। ऑर्थो में मरीजों को ऑपरेशन के लिए इम्प्लांट तक खुद खरीदकर लाने को कहा जा रहा है। एक मरीज ने बताया कि उन्हें बाहर से रॉड खरीदने को कहा गया। इसके लिए उन्हें पैसे देने पड़े। इसके अलावा सीटी, इको और अल्ट्रासाउंड की भी वेटिंग मिल रही है। मरीजों और उनके परिजनों ने प्रशासन से मांग की है कि इस बदहाली पर तुरंत संज्ञान लिया जाए और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई कर अस्पताल की व्यवस्था दुरुस्त की जाए।

क्या कहते है रिम्स के पीआरओ

इस मामले में रिम्स के पीआरओ डॉ शिशिर कुमार महतो ने बताया कि रिम्स राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल है, जहां मरीजों की भीड़ बहुत है। भीड़ अधिक होने के कारण हर जगह वेटिंग है। इसमें मरीजों को इंतजार तो करना पड़ेगा।
दवाओं की खरीदारी के लिए रेट कांट्रैक्ट किया गया है। कुछ और भी चीजें पाइपलाइन में है। टॉयलेट की सफाई भी कराने का निर्देश दिया गया है। लोगों को भी इसमें सहयोग करना होगा। रिम्स के डॉक्टरों को जेनेरिक दवा लिखने का निर्देश दिया गया है। मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास रिम्स प्रशासन कर रहा है।

 

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।