जंगल, पहाड़ और उपेक्षा के बीच सांस लेता घुराटा गांव- जहां कुदरत का सुकून है, मगर सहूलियत का सन्नाटा

मप्र-उप्र सीमा पर बसा घुराटा गांव प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है, लेकिन स्कूल भवन, सड़क, नेटवर्क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा रही है।

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अतुल तिवारी

मप्र और उप्र की सीमा पर प्रकृति की गोद में बसा घुराटा गांव। यह गांव पहाड़ों व जंगली रास्तों के कारण प्राकृतिक रूप से जितना सुंदर है, मानव सुविधाओं में उतना ही पिछड़ा हुआ। गांव तक पहुंचने के लिए पक्का रास्ता नहीं है। पहाड़ों की ढलानों व जंगल से लगे कच्चे रास्ते से होकर गांव तक पहुंचा जाता है। गांव में प्राइमरी तक स्कूल है लेकिन उसकी बिल्डिंग दो साल पहले टूटकर गिर गई। सागर से मासाब गांव तक पढ़ाने जाते हैं। जब मौसम साफ रहता है तो किसी पेड़ के नीचे स्कूल लगता है और अभी बरसात में मवेशियों के साथ सार (गाय-भैंस बांधने का स्थान) में थोड़ी सी जगह में स्कूल लगाना पड़ता है। एक ग्रामीण ने बताया कि खुले में स्कूल लगता था बारिश का मौसम है इसलिए मेरे पास जो जगह थी वह स्कूल के लिए निशुल्क उपलब्ध करा दी।

जब गांव तक पहुंचने पक्का रास्ता नहीं है तो ये तो तय था कि गांव के अंदर भी कच्चे रास्ते ही होंगे। गुरुवार शाम करीब 5 बजे जब मैं गांव पहुंचा और सरकारी प्राइमरी स्कूल के बारे में पूछा तो जिसे जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है वही उसकी फ्रिक करता है। एक 12-13 साल का बच्चा मेरे पास आया और बोला मैं आपको स्कूल तक ले चलता हूं लेकिन आपकी गाड़ी यहीं खड़ी कर दो रास्ता खराब होने के कारण ये वहां तक नहीं जा पाएगी। मैंने कहा ठीक है। थोड़े आगे चलकर जब मैंने गोबर, दलदल, मिट्टी से सना कच्चा रास्ता देखा तो कहा गाड़ी तो ठीक है यहां हम पैदल भी नहीं जा पाएंगे और कोई रास्ता नहीं है। बच्चा निराशा के भाव में बोला यही रास्ता है और यहां से हमें रोज निकलना पड़ता है। कोई कुछ नहीं करता। न स्कूल बन रही और न रोड। बड़ी उम्मीद से मेरी तरफ देखते हुए बोला सर आप ही कुछ करा दो। फिर हम उस कच्चे रास्ते से ही स्कूल तक पहुंचे। जहां सिर्फ स्कूल भवन का मलबा पड़ा था। जो दो साल से जस का तस है। ग्रामीणों ने मिट्टी और गोबर से सने रास्ते में कुछ दूरी पर पत्थर डाल रखे हैं। जिन पर ठीक ढंग से पैर जमाकर ही चलना पड़ता है। यदि पैर थोड़ा भी यहां-वहां फिसला तो जूते और कपड़े पूरे खराब।

रिपोर्टिंग के दौरान मैं इस गांव में जिस सच की तलाश में गया था। वह तो नहीं मिला लेकिन ग्रामीण जीवन की तकलीफों से सामना जरूर हुआ। ग्रामीणों ने बताया कि गांव के चारों ओर जंगल है जंगली जानवर आए दिन हमारे मवेशियों को निशाना बना रहे हैं। रात के समय हम लोग भी गांव से बाहर नहीं जाते क्योंकि गांव से निकलते ही जंगली क्षेत्र शुरू हो जाता है। यदि कोई बीमार हो जाए तो सुबह होने का इंतजार करना पड़ता है। गांव तक एंबुलेंस भी नहीं पहुंचती। धमोनी से 5 किलोमीटर दूर झारिया रानीपुरा गांव तक ही पक्का रास्ता है क्योंकि यह ग्राम पंचायत है। वहां से घुराटा के लिए 4 किमी का कच्चा रास्ता है। घुराटा की सबसे बड़ी समस्या है यहां किसी भी कंपनी का मोबाइल नेटवर्क नहीं है। एक नजरिए से देखे तो यह समस्या है क्योंकि इमरजेंसी में किसी को फोन भी नहीं लगा सकते लेकिन दूसरे नजरिए से देखें तो लोगों के सुकून का यह एक अहम जरिए है। यहां लोग मोबाइल में घुसे नहीं रहते बल्कि आसपास बैठे एक-दूसरे से बतयाते हैं।

घुराटा तक पहुंचने के लिए पहले मसवासी ग्रंट, कुल्ल, बहरोल और धामोनी होते हुए सीधा रास्ता था लेकिन उल्दन बांध परियोजना में कुल्ल से बहरोल तक रास्ता जलमग्न होने के कारण सागर से बांदरी, रजवांस, पिडरूआ गांव होते हुए बहरोल तिगड्डा से धमोनी वाला रोड पकड़कर जाना पड़ता है। पिडरूआ से घुराटा तक जंगली सूनसान क्षेत्र और बारिश के मौसम में रोड किनारे हरे-भरे लहराते पेड़ सफर में काफी सुकून देते हैं। मप्र-उप्र का सीमा क्षेत्र होने के कारण यहां इंसानी आबादी कम है। सरकारों का विकास भी यहां ज्यादा तेज नहीं दौड़ पा रहा। इस कारण इस क्षेत्र में हरियाली और शांति बची हुई है। रास्ते में धामोनी में कुछ ऐतिहासिक व पुरातत्व महत्व की इमारतों के दर्शन भी हो जाते हैं बारिश के कारण किले तक पहुंचना संभव नहीं है इसलिए वहां पर्यटकों का जाना अभी बंद है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।