

रांची : झारखंड के सम्मानित संत और आध्यात्मिक हस्ती हज़रत सय्यिदी सरकार कुतुबुद्दीन रिसालदार शाह बाबा (रहमतुल्लाह अलैह), जिन्हें कुतुब-ए-झारखंड के नाम से जाना जाता है, का 219वां सालाना उर्स पूरे अकीदत, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। उर्स के अवसर पर देश-प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में अकीदतमंद डोरंडा स्थित बाबा की दरगाह पर पहुंचकर चादरपोशी और फातिहाख्वानी कर रहे हैं।





कहते हैं कि रांची के डोरंडा इलाके को वर्ष 1808 ईस्वी में एक महान आध्यात्मिक हस्ती के आगमन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हज़रत सय्यिदी सरकार कुतुबुद्दीन रिसालदार शाह बाबा को कुतुब-ए-झारखंड और रईस-उल-अतकिया के नाम से भी जाना जाता है। उनकी दरगाह लंबे समय से श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।
मान्यता है कि बाबा रिसालदार शाह ने अपना जीवन मानवता की सेवा और ईश्वर की इबादत में समर्पित कर दिया। उनकी दरगाह पर धर्म और समुदाय की सीमाओं से परे बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भी बाबा की दरगाह पर माथा टेककर अमन, शांति और अपनी मनोकामनाओं के लिए दुआ करते हैं।
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, हज़रत कुतुबुद्दीन रिसालदार शाह बाबा ब्रिटिश शासन के दौरान रिसालदार के पद पर आधिकारिक सेवा के सिलसिले में केरल से रांची आए थे। उस समय रांची अविभाजित बिहार प्रांत का महत्वपूर्ण शहर था। सरकारी जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने अपना जीवन धार्मिक आस्था, सादगी और मानव सेवा के लिए समर्पित रखा।
बताया जाता है कि उनके पीर-ओ-मुर्शिद कुदवत-उस-सालिकीन हुज़ूर सय्यिदी सरकार अब्दुल रहमान शाह (रहमतुल्लाह अलैह) थे और उनकी आध्यात्मिक परंपरा शेरघाटी स्थित लोदी शहीद शरीफ की दरगाह से जुड़ी रही।
बाबा रिसालदार शाह की पहचान उनकी सादगी, विनम्रता, दीनदारी और इंसानियत से रही। ऊंचे सरकारी पद पर रहने के बावजूद वे नमाज और रोजे के पाबंद रहे। गरीबों, जरूरतमंदों और अनाथों के प्रति उनके दिल में विशेष प्रेम और करुणा थी। उनका जीवन अल्लाह की इबादत और उसकी मखलूक की सेवा के लिए समर्पित रहा।
आज भी डोरंडा स्थित उनकी दरगाह श्रद्धालुओं और अकीदतमंदों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। 219वें उर्स के दौरान दरगाह परिसर में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ बड़ी संख्या में जायरीन के पहुंचने का सिलसिला जारी है। अकीदतमंद बाबा की मजार पर चादरपोशी कर अमन, चैन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ मांग रहे हैं।
हज़रत बाबा रिसालदार शाह की दरगाह की यही खासियत है कि यहां आने वाले लोगों के बीच मजहब, जाति और ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है और इंसानियत एवं भाईचारे का संदेश मजबूत होता है।
