जामिया प्रदर्शन : अर्द्धसैनिक बल, दंगा-रोधी वाहन और बंद गेट, रेलिंग के पार से हो रही रिपोर्टिंग

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ बहाली की मांग पर प्रदर्शन जारी है। भारी पुलिस तैनाती के बीच छात्र चुनाव की तारीख और संविधान मंजूरी की समयसीमा घोषित करने पर अड़े हैं।

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नई दिल्ली : राष्ट्रीय राजधानी में स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया (जेएमआई) विश्वविद्यालय तीन दिन से छावनी बना हुआ है जहां विद्यार्थी छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। संस्थान के गेट नंबर सात के बाहर अर्धसैनिक बल तथा पुलिस कर्मी दंगा रोधी वाहनों के साथ तैनात हैं जबकि बंद द्वार के दूसरी ओर: परिसर के अंदर जामिया के सुरक्षा गार्ड खड़े हैं। उनके पीछे ही विद्यार्थी अपनी मांगों को लेकर धरना दे रहे हैं।

ओखला मोड़ को बटला हाउस से जोड़ने वाले मौलाना मोहम्मद अली जौहर मार्ग के दोनों ओर स्थित विश्वविद्यालय के परिसरों के बाहर सुरक्षा कर्मियों की भारी तैनाती है। हॉली फैमिली अस्पताल के पास स्थित जामिया के नवाब मंसूर अली खान पटौदी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से लेकर करीब एक किलोमीटर आगे जामिया स्कूल तक हर कुछ कदम पर पुलिस या केंद्रीय अर्धसैनिक बल के जवान तैनात हैं जबकि सड़क की दूसरी ओर स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर कुलपति कार्यालय तक जगह-जगह सुरक्षा कर्मियों की तैनाती है।

विश्वविद्यालय के गेट नंबर सात पर सबसे अधिक गहमागहमी दिखी, जहां पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) स्तर के एक अधिकारी के साथ-साथ दो अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त तैनात थे। इस गेट के अंदर स्थित मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब की प्रतिमा के पास छात्र धरना दे रहे हैं जबकि मीडियाकर्मी अंदर चल रहे धरने और नारेबाजी को जेलनुमा रेलिंग के बाहर से कवर कर रहे हैं। इस दौरान सड़क से गुजरने वाले वाहन चालक प्रदर्शन देखने के लिए गाड़ियों की रफ्तार धीमी कर रहे हैं, जिससे इलाके में यातायात बाधित हो रहा है।

गाड़ियों के हॉर्न के शोर के बीच पुलिस लाउडस्पीकर के जरिए लगातार घोषणाएं कर बता रही है कि इलाके में बीएनएसएस की धारा 163 लागू है, जिसके तहत लोगों के जमावड़े पर रोक है। पुलिस की सख्ती इतनी है कि किसी भी राहगीर तो क्या, पत्रकार तक को गेट के पास रुकने नहीं दिया जा रहा है।

जामिया में प्रदर्शन की वजह से कक्षाएं ऑनलाइन कर दी गई हैं। प्रशासन बिना पहचान पत्र (आईडी कार्ड) के किसी को भी परिसर में प्रवेश नहीं करने दे रहा है। पत्रकार, पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की निगरानी में परिसर की चारदीवारी के साथ लगी सलाखों जैसी रेलिंग से प्रदर्शनकारी छात्रों को आवाज लगाकर बुला रहे हैं और उनसे बात कर रहे हैं।

कुछ प्रदर्शनकारियों ने रेलिंग के पास आकर पत्रकारों से बातचीत की। छात्र संघ की जरूरत के सवाल पर उन्होंने दावा किया कि यदि छात्र कोई भी मुद्दा उठाते हैं, तो प्रशासन सीधे कारण बताओ नोटिस या निलंबन का नोटिस थमा देता है। इसके अलावा, ज्ञापन देने जाने पर उन्हें प्रशासनिक दफ्तर में प्रवेश तक नहीं करने दिया जाता और पूछा जाता है कि वे हैं कौन, जो उनसे बात की जाए।

विश्वविद्यालय में बीए प्रथम वर्ष के छात्र अतीक उर रहमान ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में जामिया प्रशासन पर तानाशाहीपूर्ण रवैये का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि छात्र संघ की बहाली के बाद इस व्यवहार से काफी हद तक मुकाबला किया जा सकेगा। रहमान ने कहा कि फिलहाल स्थिति यह है कि कोई भी मांग उठाने वाले छात्रों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी करने, निलंबित करने या निष्कासित करने जैसे कदम उठाए जाते हैं। उन्होंने कहा, “छात्र संघ होने से हमें इन समस्याओं से निपटने में काफी मदद मिलेगी।”

बीए (समाजशास्त्र) की छात्रा श्रद्धा ने कहा कि छात्र संघ न होने के कारण विद्यार्थियों की कोई आवाज नहीं है। श्रद्धा ने कहा, “छात्रावास जैसी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कई समस्याएं आती हैं, लेकिन हमें समझ नहीं आता कि उनके समाधान के लिए किससे संपर्क करें। जब हम ज्ञापन लेकर प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने जाते हैं, तो वे हमें अपने कार्यालयों में प्रवेश तक नहीं करने देते और पूछते हैं कि हम कौन हैं और किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। छात्र संघ होने पर ऐसी समस्याएं नहीं आएंगी और प्रशासन को हमारी बात सुननी होगी।”

जामिया में पीएचडी के छात्र सौरभ 11 महीने से परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध का सामना कर रहे हैं। आइसा के जामिया सचिव सौरभ ने कहा कि प्रशासन ने बार बार प्रदर्शन का हवाला देते हुए उन्हें परिसर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया है। उन्होंने कहा कि जिन अधिकारों के बारे में स्कूलों में सामाजिक विज्ञान की किताबों में हमने पढ़ा है, उनका इस्तेमाल करने पर जामिया में बीते 20 सालों में छात्रों को कारण बताओ नोटिस और निलंबन का सामना करना पड़ा है।

बीए उर्दू द्वितीय वर्ष के छात्र नसीम ने छात्र संघ की जरूरत समझाते हुए हालिया उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि हाल ही में छात्रावास आवंटन की सूची जारी की गई, जो निर्धारित समय से करीब डेढ़ महीने की देरी से आई और इससे विद्यार्थियों को काफी परेशानी हुई। नसीम ने कहा कि अगर छात्र संघ होता, तो शायद ऐसी स्थिति नहीं बनती। उन्होंने आरोप लगाया, “प्रशासनिक कार्यालयों में बैठे कर्मचारी भी विद्यार्थियों से ठीक से बात नहीं करते और कई बार उनके साथ बदसलूकी करते हैं। मेरे साथ भी ऐसा हो चुका है। छात्र संघ होने पर कर्मचारियों के इस तरह के व्यवहार पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।”

जामिया में वर्ष 2006 से छात्र संघ नहीं है। हालांकि, बीते 17 दिन से हो रहे प्रदर्शनों के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराने का निर्णय लिया है। इसके बावजूद छात्रों ने आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया है। प्रदर्शनकारी छात्र अब चुनाव की निश्चित तारीख घोषित करने और संविधान को मंजूरी देने के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा तय करने की मांग पर अड़े हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।