

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने चौथे चरण में अंगीभूत किए गए कॉलेजों के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि विश्वविद्यालय द्वारा नियमित एवं समाहित किए जा चुके कर्मचारियों को वेतन पुनरीक्षण का लाभ देने से राज्य सरकार इंकार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे कर्मचारियों को 5वें, 6वें और 7वें वेतन आयोग की अनुशंसाओं का लाभ मिलना उनका वैधानिक अधिकार है। यह फैसला करमचंद भगत कॉलेज, बड़ो के शिक्षकेत्तर कर्मचारी जगदीश उरांव की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके वेतन पुनरीक्षण के दावे को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया गया था कि उनका मामला अन्य कर्मचारियों से भिन्न है।





करमचंद भगत कॉलेज की स्थापना वर्ष 1976 में हुई थी। बाद में बिहार सरकार के निर्णय के तहत 31 अक्टूबर 1986 से इस कॉलेज को रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत अंगीभूत कॉलेज का दर्जा दिया गया। जगदीश उरांव की नियुक्ति वर्ष 1983 में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के रूप में हुई थी और वे लगातार अपनी सेवा देते रहे। वर्ष 1986 में बिहार सरकार ने राज्य के संबद्ध कॉलेजों को चरणबद्ध तरीके से अंगीभूत करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके तहत विश्वविद्यालयों से शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का विवरण मांगा गया। जांच के बाद सरकार ने 12 फरवरी 1990 को उन कर्मचारियों की सूची जारी की, जो निर्धारित कट-ऑफ तिथि से पहले स्वीकृत या अनुशंसित पदों पर कार्यरत पाए गए थे। इस सूची में जगदीश उरांव का नाम भी शामिल था।
बाद के वर्षों में नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। बड़ी संख्या में कर्मचारियों की सेवाएं संकट में पड़ गईं। इस संबंध में बिहार राज्य एम.एस.ई.एस.के.के. महासंघ ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। पटना हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की जांच के लिए न्यायमूर्ति एस.सी. अग्रवाल आयोग का गठन किया। आयोग की रिपोर्ट पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2004 में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया और विश्वविद्यालयों को झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 2000 की धारा 4(1)(14) के तहत कर्मचारियों के समायोजन एवं नियमितीकरण का अंतिम अधिकार प्रदान किया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि विश्वविद्यालय द्वारा नियमितीकरण के बाद राज्य सरकार उस पर दोबारा आपत्ति नहीं उठा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में रांची विश्वविद्यालय ने वर्ष 2005 में जगदीश उरांव की सेवा का समायोजन किया तथा 12 जनवरी 2007 की अधिसूचना जारी कर उनकी सेवा नियमित कर दी। इसके बाद विश्वविद्यालय ने उनके 5वें वेतनमान के पुनरीक्षण का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा, लेकिन सरकार ने उसे स्वीकृति नहीं दी। सरकार के इस रवैये के खिलाफ याचिकाकर्ता ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रेष्ठ गौतम ने अदालत को बताया गया कि इसी कॉलेज के अन्य शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को पूर्व में हाईकोर्ट के आदेश के बाद 5वें और 6वें वेतन आयोग का लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में समान परिस्थितियों में कार्यरत कर्मचारी को लाभ से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। इस दौरान अधिवक्ता श्रेष्ठ गौतम के जूनियर अधिवक्ता योगेन्द्र यादव ने सक्रिय सहयोग किया।
राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता का नाम न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा आयोग की रिपोर्ट में नहीं था, इसलिए वे वेतन पुनरीक्षण के लाभ के पात्र नहीं हैं। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जब विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुरूप सेवा नियमित कर दी है, तब राज्य सरकार बाद में उस नियमितीकरण पर सवाल नहीं उठा सकती। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि सरकार वर्षों तक सेवा लेने के बाद अब नियुक्ति की वैधता पर प्रश्न नहीं उठा सकती।
कोर्ट ने माना कि समान परिस्थितियों वाले अन्य कर्मचारियों को पहले ही लाभ दिया जा चुका है, इसलिए वर्तमान याचिकाकर्ता को लाभ से वंचित रखना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता के वेतन पुनरीक्षण के दावे को अस्वीकार किया गया था। अदालत ने सरकार एवं संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 5वें, 6वें और 7वें वेतन आयोग की अनुशंसाओं का लाभ प्रदान किया जाए तथा बकाया राशि का भुगतान भी सुनिश्चित किया जाए।
