
Jharkhand Education: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में राज्य की स्थानीय और जनजातीय भाषाओं को प्राथमिकता दिए जाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। राज्य की कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने भाषा समिति के समक्ष विस्तृत सुझाव और शैक्षणिक तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा कि JTET केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षकों की योग्यता तय करने वाली महत्वपूर्ण अर्हता परीक्षा है।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, शिक्षण का आधार
मंत्री ने कहा कि झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषा सिर्फ संचार का माध्यम नहीं बल्कि शिक्षण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण उपकरण (शैक्षणिक उपकरण) है। उन्होंने पूर्व आयुक्त कुमार सुरेश सिंह की अनुशंसाओं और राम दयाल मुंडा द्वारा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा अध्ययन को बढ़ावा देने के प्रयासों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि राज्य की प्रमुख जनजातीय भाषाएं—कुड़ुख भाषा, मुंडारी भाषा, संताली भाषा, खरिया भाषा और हो भाषा तथा क्षेत्रीय भाषाएं—खोरठा भाषा, कुरमाली भाषा, नागपुरी भाषा और पंचपरगनिया भाषा को शैक्षणिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए।
स्थानीय भाषा जानने वाला शिक्षक ही बच्चों को बेहतर समझ सकता है
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि जिन भाषाओं के माध्यम से विद्यार्थियों की पढ़ाई होती है, उन्हीं भाषाओं को शिक्षक पात्रता परीक्षा में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इससे विद्यालयों में नियुक्त शिक्षक विद्यार्थियों की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई पृष्ठभूमि को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
उनका कहना है कि इसका उद्देश्य किसी वर्ग को बाहर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि शिक्षक बच्चों से उनकी परिचित भाषा में संवाद स्थापित कर सकें।
भोजपुरी, मगही और अंगिका को शामिल करने का विरोध
मंत्री ने JTET में भोजपुरी भाषा, मगही भाषा और अंगिका भाषा को शामिल करने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि झारखंड का गठन उसकी अलग सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से हुआ था।
उन्होंने तर्क दिया कि प्रवासन या जनसंख्या परिवर्तन को आधार बनाकर पड़ोसी राज्यों की भाषाओं को JTET का हिस्सा बनाना राज्यहित में नहीं होगा और इससे स्थानीय युवाओं के रोजगार अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
2023 के राजपत्र के आधार पर बने भाषा नीति
मंत्री ने मांग की कि JTET की भाषा नीति का निर्धारण 13 मार्च 2023 को जारी राजभाषा विभाग के राजपत्र (गजट संख्या 147/148) के आधार पर किया जाए। उनका कहना है कि स्थानीय नीति स्पष्ट नहीं होने की स्थिति में परीक्षा की भाषा व्यवस्था ही स्थानीय युवाओं को अवसर प्रदान करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है।

