- डॉ. राजाराम महतो ने संस्मरणात्मक पुस्तक का किया विमोचन, बोले- जो समाज अपने विद्वानों का इतिहास सहेजता है, वही अपनी पहचान और विरासत को जीवित रखता है
रांची: रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. रामखेलावन पांडेय के जीवन, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित संस्मरणात्मक पुस्तक का विमोचन किया गया. हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. नागेश्वर सिंह द्वारा संकलित इस पुस्तक का विमोचन कुरमाली भाषा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजाराम महतो ने किया. इस अवसर पर विद्वानों के योगदान को दस्तावेजों और संस्मरणों के माध्यम से संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया.

डॉ. राजाराम महतो ने डॉ. नागेश्वर सिंह के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि किसी विद्वान के जीवन और कृतित्व को संकलित करना केवल पुस्तक तैयार करना नहीं, बल्कि इतिहास की उन महत्वपूर्ण कड़ियों को सुरक्षित करना है, जिनसे आने वाली पीढ़ियां अपनी बौद्धिक विरासत को पहचान सकें. डॉ. रामखेलावन पांडेय जैसे शिक्षाविदों का जीवन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उनके अनुभवों, विचारों और योगदान को पुस्तक के रूप में संरक्षित करना सराहनीय एवं दूरदर्शी पहल है.
डॉ. राजाराम महतो ने कहा, “जो समाज अपने विद्वानों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों के योगदान को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी बौद्धिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत से दूर होता चला जाता है. इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि उन लोगों के विचारों, संघर्षों और उपलब्धियों का दस्तावेज है, जिन्होंने समाज को दिशा दी है. डॉ. नागेश्वर सिंह ने डॉ. रामखेलावन पांडेय के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को संकलित कर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाई है. ऐसे प्रयासों को केवल सराहना तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और समाज को आगे आकर ऐसे लोगों को सम्मानित एवं प्रोत्साहित करना चाहिए.”
उन्होंने कहा कि झारखंड की समृद्ध भाषाई, साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा को संरक्षित करने के लिए यहां के विद्वानों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों के जीवन एवं कार्यों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण आवश्यक है. जब किसी व्यक्तित्व के अनुभव और विचार लिखित रूप में सुरक्षित होते हैं, तभी वे समय की सीमाओं को पार कर नई पीढ़ी तक पहुंच पाते हैं. संस्मरणात्मक पुस्तकें अतीत और वर्तमान के बीच सेतु का काम करती हैं तथा विद्यार्थियों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों को अपने समाज की ज्ञान-परंपरा से जोड़ती हैं.
डॉ. नागेश्वर सिंह द्वारा संकलित यह पुस्तक डॉ. रामखेलावन पांडेय के जीवन और शैक्षणिक योगदान को सामने लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है. पुस्तक का विमोचन न केवल एक साहित्यिक उपलब्धि है, बल्कि समाज के उन व्यक्तित्वों को याद करने का अवसर भी है, जिनके ज्ञान, अनुभव और कार्यों ने शिक्षा एवं साहित्य की दुनिया को समृद्ध किया.
इस पहल से यह संदेश भी उभरता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, इतिहास, भाषा और साहित्य को सुरक्षित रखने की उसकी प्रतिबद्धता से भी आंकी जाती है. डॉ. नागेश्वर सिंह का यह संकलन इसी दिशा में एक सार्थक कदम है.


