
विनीता चौबे
- शिबू सोरेन को क्यों दिया जा रहा है पद्म भूषण?
- एक साधारण परिवार से जननेता बनने तक का सफर
- शिव चरण मांझी से शिबू सोरेन बनने की कहानी
- कैसे शुरू हुआ अलग झारखंड आंदोलन?
- जमीन बचाओ आंदोलन से मिली नई पहचान
- विधानसभा से संसद तक का राजनीतिक सफर
- विवादों से भी रहा नाता
- परिवार और राजनीतिक विरासत
- झारखंड से भावनात्मक जुड़ाव
- एक युगपुरुष की विरासत
“जिसने जंगल की आवाज़ को सदन तक पहुंचाया, वह दिशोम गुरु शिबू सोरेन कहलाया।” झारखंड की राजनीति और अलग राज्य आंदोलन का यह सबसे चर्चित नाम अब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म भूषण से सम्मानित होने जा रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत 23 जून 2026 को पद्म भूषण सम्मान प्रदान किया जाएगा। शिबू सोरेन को सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे योगदान और झारखंड राज्य के गठन में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है। गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 जनवरी 2026 को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उनके नाम की घोषणा की थी।
शिबू सोरेन को क्यों दिया जा रहा है पद्म भूषण?
‘दिशोम गुरु’ के नाम से प्रसिद्ध शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर दशकों तक संघर्ष किया। उनके नेतृत्व में चले आंदोलन और राजनीतिक प्रयासों ने झारखंड राज्य निर्माण की राह को मजबूत किया। झारखंड की जनता उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और जनआंदोलन के प्रतीक के रूप में भी याद करती है।
एक साधारण परिवार से जननेता बनने तक का सफर
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार और वर्तमान झारखंड के हजारीबाग जिले के नेमरा गांव में हुआ था, जो अब रामगढ़ जिले में स्थित है। वह संथाल जनजाति से आते थे। उनके पिता सोबरा सोरेन किसान थे और उन्होंने अन्याय व शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। परिवार ने संघर्ष और कठिनाइयों का लंबा दौर देखा, जिसने आगे चलकर शिबू सोरेन के व्यक्तित्व और विचारों को आकार दिया।
शिव चरण मांझी से शिबू सोरेन बनने की कहानी
बहुत कम लोग जानते हैं कि शिबू सोरेन का मूल नाम शिव चरण मांझी था। बचपन में ही उन्होंने अपना नाम बदल लिया। गांव के मित्र उन्हें प्यार से ‘शिबू’ कहकर बुलाते थे और यही नाम आगे चलकर उनकी सार्वजनिक पहचान बन गया। वहीं ‘सोरेन’ उपनाम ने उनकी जनजातीय पहचान को और मजबूत किया।
कैसे शुरू हुआ अलग झारखंड आंदोलन?
1960 और 70 के दशक में झारखंड क्षेत्र में खनिज संसाधनों और जमीनों पर बाहरी कब्जे को लेकर आदिवासी समाज में असंतोष बढ़ रहा था। उस समय आदिवासी समुदाय अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहा था। इसी दौर में शिबू सोरेन ने इस मुद्दे को बड़े जनआंदोलन का रूप दिया। वर्ष 1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। संगठन का उद्देश्य अलग झारखंड राज्य की मांग, आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा और शोषण के खिलाफ संगठित संघर्ष करना था। जनसभाओं, धरनों और आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने हजारों युवाओं को इस अभियान से जोड़ा।
जमीन बचाओ आंदोलन से मिली नई पहचान
शिबू सोरेन की प्रमुख उपलब्धियों में ‘जमीन बचाओ आंदोलन’ को विशेष रूप से याद किया जाता है। उन्होंने आदिवासियों की जमीन पर अवैध कब्जों के खिलाफ आवाज उठाई और कई मामलों में सीधे हस्तक्षेप भी किया। इस आंदोलन ने उन्हें जनजातीय समाज के बीच व्यापक सम्मान दिलाया । यहीं से उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की पहचान मिली।
विधानसभा से संसद तक का राजनीतिक सफर
शिबू सोरेन 1980 में पहली बार सांसद चुने गए। इसके बाद वह कई बार लोकसभा पहुंचे और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री तथा जनजातीय मामलों के मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रहे। वर्ष 2004 में वह पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा। बाद में 2009 में उन्होंने फिर मुख्यमंत्री पद संभाला। उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा आदिवासी अधिकार, स्थानीय लोगों को प्राथमिकता और जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा रहा।
विवादों से भी रहा नाता
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा। उन पर विभिन्न मामलों में आरोप भी लगे। वर्ष 2006 में एक पुराने मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया था, लेकिन बाद में अदालत से उन्हें राहत मिली। राजनीतिक और कानूनी चुनौतियों के बावजूद उनकी पहचान जनसंघर्ष के नेता के रूप में बनी रही।
परिवार और राजनीतिक विरासत
आज उनके पुत्र हेमंत सोरेन झारखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं। सोरेन परिवार झारखंड की राजनीति का प्रमुख नाम बन चुका है, लेकिन आम लोगों के बीच शिबू सोरेन की छवि आज भी जमीन से जुड़े नेता की बनी हुई है।
झारखंड से भावनात्मक जुड़ाव
शिबू सोरेन अक्सर जल, जंगल और जमीन की बात करते थे। उनका मानना था कि स्थानीय संसाधनों पर पहला अधिकार स्थानीय लोगों का होना चाहिए। उनका यह संदेश आज भी झारखंड के गांवों, कस्बों और आदिवासी इलाकों में सुनाई देता है।
एक युगपुरुष की विरासत
शिबू सोरेन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का वाहक बन सकता है। शिव चरण मांझी से दिशोम गुरु बनने तक का उनका सफर केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। आज भी झारखंड में उनका नाम संघर्ष, स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

