ग्रेट निकोबार परियोजना के विरोध में दायर जनहित याचिकाओं के खिलाफ केंद्र की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं के खिलाफ केंद्र की याचिका खारिज कर दी। कलकत्ता उच्च न्यायालय को नवंबर में सुनवाई करने का निर्देश दिया गया है।

Razi Ahmad
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नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ केंद्र की याचिका पर सुनवाई से सोमवार को इनकार कर दिया, जिसमें ‘‘ग्रेट निकोबार द्वीप मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’’ के लिए सहमति लेने में वन अधिकार कानून के उल्लंघन का आरोप लगाने वाली जनहित याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामला पहले से ही उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और 25 तथा 26 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

पीठ ने उच्च न्यायालय से कहा कि वह तय तारीख पर सभी लंबित याचिकाओं समेत मामले की सुनवाई करे। शुरुआत में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि यह मुद्दा ‘बहुत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व’ का है। उन्होंने सवाल उठाया था कि इस मुद्दे से संबंधित जनहित याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

उन्होंने कहा कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी को पहले ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में चुनौती दी जा चुकी है। उन्होंने बाद में कई कार्यवाहियां शुरू किए जाने पर चिंता जताई।

वेंकटरमणि ने कहा, ‘‘कोई व्यक्ति वर्षों बाद आता है और याचिका दायर करता है, फिर तीन अलग-अलग याचिकाएं तीन अलग-अलग तरीकों से इसे चुनौती देने की कोशिश करती हैं। फिर वे कहते हैं कि आदिवासी प्रभावित हैं और वे अदालत के समक्ष नहीं हैं। अब उन्होंने उन आदिवासी समूहों को भी पक्षकार बना लिया है।’’

उन्होंने कहा कि याचिका के सुनवाई योग्य होने का सवाल मामले की जड़ तक जाता है और अदालत से अनुरोध किया कि वह केंद्र को इस मुद्दे पर आगे दलीलें रखने की अनुमति दे।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं केवल दरवाजा खुला रखना चाहता हूं, और कुछ नहीं। कम से कम हमें कुछ कहने की अनुमति दीजिए।’’

मामले में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भी कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी से संबंधित एनजीटी की कार्यवाही में दो दौर की सुनवाई हो चुकी है।

इस मामले में पक्षकार बनाए गए एक आदिवासी परिषद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने कहा कि यह मुद्दा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) से संबंधित है और इसलिए जनहित याचिका सुनवाई योग्य है।

न्यायमूर्ति बागची ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि चूंकि याचिका की विचारणीयता पर पहले ही फैसला हो चुका है, इसलिए इसमें निहित जनहित याचिका के दायरे से जुड़े सवालों को खुला रखा जा सकता है।

हालांकि, मुरलीधर ने कहा कि जनहित किस हद तक कायम है, यह सवाल ही शायद अकादमिक हो सकता है, क्योंकि आदिवासी परिषद ने पक्षकार बनाए जाने के लिए आवेदन दायर किया है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि व्यापक सवाल मूल निवासी समुदायों की पहचान और संस्कृति के संवैधानिक संरक्षण से संबंधित है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मामले की जल्द से जल्द सुनवाई करने का अनुरोध करेगी।

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।