India Energy Security : मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच अंतरिम शांति समझौता होने से वैश्विक बाजारों को तत्काल राहत मिली है। समझौते के तहत महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को फिर से खोलने और तेल आपूर्ति बहाल करने की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसके बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी देखी गई।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए खतरा पूरी तरह टला नहीं है। वजह यह है कि युद्ध और आपूर्ति बाधाओं के दौरान तेल एवं गैस उत्पादन, परिवहन और भंडारण ढांचे को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई में समय लगेगा। कई विश्लेषकों का अनुमान है कि कच्चे तेल के बाजार को सामान्य स्थिति में लौटने में 6 से 12 महीने तक का समय लग सकता है।
भारत की चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है। रिपोर्टों के अनुसार भारत लगभग 40% कच्चा तेल, 60% LNG और 90% LPG आयात के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर है। तेल की कीमत में प्रत्येक 1 डॉलर की वृद्धि भारत के आयात बिल में अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है।
समझौते के बाद तेल बाजारों में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है और भारतीय रुपये को भी समर्थन मिला है। विश्लेषकों के अनुसार होर्मुज़ मार्ग के खुलने और आपूर्ति बहाल होने से भारत के चालू खाते के घाटे तथा ईंधन आयात लागत पर दबाव कम हो सकता है।
फिर भी विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि किसी समझौते पर हस्ताक्षर होना और उसका पूरी तरह लागू होना अलग बातें हैं। यदि समझौते की शर्तों के पालन में कोई बाधा आती है या क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ता है, तो तेल बाजार दोबारा अस्थिर हो सकते हैं।
यानी फिलहाल भारत को तत्काल राहत के संकेत तो मिले हैं, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और तेल कीमतों के मोर्चे पर पूरी तरह निश्चिंत होने की स्थिति अभी नहीं बनी है। अगले कुछ महीने यह तय करेंगे कि यह समझौता स्थायी स्थिरता लाता है या केवल अस्थायी राहत साबित होता है।


