सुशोभित
सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों का यह प्रिय मंत्र है। बिना संदर्भ-प्रसंग-अर्थ जाने वे इसका पाखण्डपूर्ण जाप करते रहते हैं। बहुधा कहा जाता है कि : “भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र है वसुधैव कुटुम्बकम्।” यानी हम पूरे विश्व को ही अपना परिवार समझते हैं। ज़ाहिर है कि यह सरासर झूठ है। कुछ समय पू्र्व भारत के एक नेता से विदेश में एक असहज कर देने वाला प्रश्न पूछा गया तो वो सवाल का जवाब देने के बजाय वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्र जपने लगा। इस तथाकथित कौटुम्बिकता से उस प्रश्न का क्या सम्बंध था, यह स्पष्ट नहीं किया गया। लेकिन, क्या आपको मालूम है कि वसुधैव कुटुम्बकम् का मूल क्या है? यह किस ग्रंथ में, किस प्रसंग में, किस पात्र के द्वारा कही गई बात थी? सच्चाई यह है कि वसुधैव कुटुम्बकम् एक छलपूर्ण कथन है! आपको यह जानकर आश्चर्यमिश्रित कष्ट होगा कि वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्रजाप हितोपदेश में एक खलचरित्र द्वारा एक निर्दोष प्राणी को भुलावे में लेने के लिए किया गया था-
“अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसां
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।”
(“यह मेरा मित्र है और वह नहीं, ऐसे निकृष्ट निचार क्षुद्र मनुष्यों के होते हैं। उदार चरित वालों के लिए तो समस्त वसुधा ही अपना परिवार है।”)
नारायण पंडित द्वारा रचित हितोपदेश का यह कथन है। मित्रलाभ, सुहृद्भेद, विग्रह और संधि आदि चार भागों में विभक्त नीतिकथाओं के इस संकलन का रचनाकाल पाँचवीं सदी माना जाता है। कथा यह है कि चित्रांग नामक एक पुष्ट मृग को देखकर क्षुद्रबुद्धि नामक शृगाल के मन में उसका मांसभक्षण करने की इच्छा जाग्रत होती है। इसके लिए वह छलावरण की योजना अपनाता है। वह चित्रांग के पास जाकर बोलता है कि वह उसकी मित्रता का मुखापेक्षी है। भोला हरिण उस पर विश्वास कर लेता है। दोनों साथ-साथ चल पड़ते हैं। चम्पक नामक वृक्ष पर सुबुद्धि नामक काग यह देखता है तो चित्रांग को सचेत करता है। ध्यान दीजिए, काग का नामकरण ‘सुबुद्धि’ और शृगाल का नामकरण ‘क्षुद्रबुद्धि’ करके कथाकार ने पहले ही अपने मंतव्य को प्रकट कर दिया है। सुबुद्धि चित्रांग से कहता है कि उसे किसी भी अपरिचित पर इतनी शीघ्रता से विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, जिस पर चालाक शृगाल तुरंत “वसुधैव कुटुम्बकम्” का जाप करता है। वह कहता है कि जब अखिल विश्व ही एक कुटुम्ब है तो फिर भय किस बात का? हितोपदेश में यह उक्ति जड़दग्व और दीर्घकर्ण के रूप में फिर दोहराई जाती है। और इस बार दीर्घकर्ण नामक बिल्ली जड़दग्व नामक गिद्ध को वसुधैव कुटुम्बकम् का उपदेश देकर उसका शिकार करने में सफल रहती है! मंतव्य सुस्पष्ट है : जो भी आपसे कहे वसुधैव कुटुम्बकम्, उससे सावधान! यह विश्व सम्भावित शत्रुओं से भरा हुआ है, और हमें आँखें मूँदकर किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए!
विष्णु शर्मा के पंचतंत्र में भी वसुधैव कुटुम्बकम् का उपहास किया गया है। पंचतंत्र में चार ब्राह्मण मित्रों की एक कथा है, जिसमें जो सबसे वज्रमूर्ख होता है, वह वसुधैव कुटुम्बकम् का जाप करता है। यानी जहाँ नारायण पंडित का आग्रह था कि वसुधैव कुटुम्बकम् एक छल है, वहीं विष्णु शर्मा का आग्रह तो यह है कि यह निरी मूर्खता है! अगर मैं भूल नहीं कर रहा हूँ तो चाणक्य के अर्थशास्त्र, विक्रम चरित् और महोपनिषद् में भी एक-एक बार वसुधैव कुटुम्बकम् का उल्लेख आया है। महोपनिषद् में यह वाक्य एक भिन्न अर्थछटा (सर्वात्मवाद) से आया है और उसके प्रभाव से कालान्तर में यह विश्व-बंधुत्व की भावना की अभिव्यक्ति के रूप में चल निकला। स्वामी विवेकानंद बहुधा इस पद का प्रयोग करते थे, किंतु स्वामीजी तो सच में ही विश्व-बंधुत्व और सर्वधर्मसमभाव की भावना से संचालित थे (“भारत को वेदान्ती मस्तक और इस्लामी शरीर की आवश्यकता है।” -स्वामी विवेकानंद)। क्या यही बात वर्तमान में सांस्कृतिक-राष्ट्रवादियों के लिए कही जा सकती है?
वास्तव में, सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद या हिन्दुत्व तो मूलत: एक एक्सक्लूसिविस्ट अवधारणा है और वह इनक्लूसिविस्ट नेहरूवादी प्रवर्तन के विरोध में एकजुट है। “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं”, इसका मूल है। “गर्व से कहो हम मनुष्य हैं”, नहीं। अलबत्ता दोनों ही मामलों में गर्व करने का कोई कारण नहीं है। भारतवर्ष, हिन्दू राष्ट्र, आर्यावर्त, अखण्ड भारत, यह उनकी चिंताओं के मूल में है, सकल विश्व नहीं। कुटुम्ब में तो परस्पर का विचार होता है, जिसमें स्वयं हानि उठाकर भी दूसरों को लाभ पहुँचाने की भावना रहती है, बशर्ते वह कलह और क्लेश से भरा कुटुम्ब ना हो। अगर वसुधैव कुटुम्बकम् के मूल में ऐसे ही क्लेशपूर्ण कुटुम्ब की अवधारणा है तो और बात है!
विश्व-बंधुत्व तो दूर, भारत के लोगों ने तो अपने ही देशवासियों के प्रति ऊँच-नीच की भावना से भर जाति-व्यवस्था रची है। फलाँ लोग वर्ण-व्यवस्था में नीचे क्रम पर रहेंगे, फलाँ उसके बाहर रहेंगे, फलाँ इस कुएँ से पानी नहीं पी सकते, फलाँ मंदिर में पुजारी नहीं बन सकते, फलाँ बारात में घोड़ी नहीं चढ़ सकते आदि-इत्यादि तो यहाँ का इतिहास और वर्तमान रहा है। पूर्वोत्तर के लोग हमारे नहीं हैं, संथाल हमारे नहीं हैं, मद्रासी पराये हैं, आदिवासी हममें से नहीं हैं, निषाद-किरात-शूद्र-अनार्य हमसे अलग हैं : यही चिंतन इनका सदियों से चला आया है और ये दम भरते हैं वसुधैव कुटुम्बकम् का, और वो भी बिना उसका अर्थ-संदर्भ-प्रसंग जाने।
वसुधैव कुटुम्बकम् अपनी उदात्त-भावना में भी केवल उन लोगों के लिए है, जो सकल विश्व को अपना राष्ट्र मानते हैं (कॉस्मोपोलिटन), मानवमात्र को अपना बंधु मानते हैं, वैश्विक संस्कृति के प्रति खुले और सदाशय होते हैं, और समावेश की भावना से संचालित होते हैं, विशिष्ट होने की दर्प-दीप्ति से नहीं। हमारे सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी बंधुओं को तो इस श्रेणी में नहीं ही रखा जा सकता। लेकिन कम से कम बोलने से पहले थोड़ा पढ़ तो लें कि कौन-सी बात किस प्रसंग में कही गई थी- माना कि पढ़ने-सोचने-विचारने से इन लोगों की ‘क्षुद्रबुद्धि’ सरीखी शत्रुता है!

