
डॉ जंग बहादुर पाण्डेय
धन्य आज का मुक्ति-दिवस,गाओ जन मंगल,
भारत-लक्ष्मी से शोभित फिर भारत-शतदल।
तुमुल जय ध्वनि करो, महात्मा गांधी की जय।,
नवभारत के सुज्ञ सारथी वह नि:संशय,
राष्ट्रनायकों का हे, पुनः करो अभिवादन।
जीर्ण जाति में भरा जिन्होंने नूतन जीवन।
स्वतंत्रता-दिवस -सुमित्रानंदन पंत

जिस तरह व्यक्ति के जीवन की कोई घटना और उस घटना से जुड़ी हुई तिथि अविस्मरणीय हो जाती है, उसी तरह राष्ट्रीय धरातल पर कोई ऐसा दिन भी होता है; जो जन जीवन के लिए गौरव और पूजा का रूप ले लेता है। भारत वर्ष में स्वाधीनता दिवस अर्थात् 15 अगस्त इसी तरह की पूज्य तिथि है। भारतीय इतिहास में यह ऐसा अध्याय है, जिसके हर एक शब्द में शहीदों के खून की झलक मिलती है। सत्य और अहिंसा की ज्योति मिलती है और मिलती है हमारे पूर्वजों की अखण्ड साधना की पूर्णाहुति। वर्षों से वंदिनी भारत माँ के हाथों से जंजीर खोलने वाला यह दिन क्या हमारे देशभक्तों की कुर्बानियाँ और ललनाओ के सुहाग त्याग की कथा को भूल पाएगा? आज के अवसरवादी राजनीतिज्ञों ने स्वाधीनता दिवस के सारे सपनों को अपने पाँवों से कुचल दिया है; लेकिन याद रहे किसी न किसी दिन शहीदों के खून से क्रांति की ज्वाला अवश्य फूटेगी। 15 अगस्त 1947 का दिन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है। जहाँ से उन्मुक्त भारत का अभिनव अध्याय खुलता है। इसी 15 अगस्त को विदेशी शासन के काले बादल छँटे थे, विदेशियों के अत्याचारों का कारकापात बंद हुआ था। उनके शोषण का शोणितस्त्राव रुका था। उस दिन की उषा वन्दिनी नहीं थी, उस दिन की सुहावनी किरणों पर दासता की कोई परछाई नहीं थी। उस दिन का सिंदुरी सवेरा पक्षियों की चहचहाहट और देशवासियों की खिलखिलाहट से अनुगुंजित हो रहा था। जन-जीवन ने मुद्दत के बाद नई अंगड़ाई ली थी। एक नई ताजगी का ज्वार सर्वत्र लहरा रहा था।
1192 ई. में ही ताराइन के मैदान में पृथ्वीराज की पराजय के साथ-साथ हमारे स्वातंत्र्य सूर्य को ग्रहण लग गया था ,किन्तु 1757 ई. के पलासी युद्ध में तो उसे अंग्रेज असुर ने पूरी तरह ग्रस लिया। परिणामत: भारत माता पूरी तरह वन्दिनी हो गई और हम उनकी संतान पूर्णत: लौह-श्रृंखलित। हम जानते हैं कि ज़ब स्वतंत्रता चली जाती है तब जीवन निस्तेज हो जाता है, उसमें कोई उत्साह नहीं रहता। स्वतंत्रता यदि स्वर्ग है तो परतंत्रता साक्षात् नरक। परतंत्रता संसार का सबसे घृणित पाप है। महाकवि तुलसी ने ठीक ही कहा है कि :-
कत विधि सृजी नारी जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुख नाही।
सुप्रसिद्ध चिंतक सुकरात ने कभी कहा था कि परतंत्रता अत्याचार और डकैती की अमानुषी प्रणाली है। आर. जी. इगरसोल ने कहा था कि नेत्रों के लिए जैसे प्रकाश है, फेफड़ों के लिए जैसे वायु है, हृदय के लिए जैसे प्यार है, उसी प्रकार मनुष्य की आत्मा के लिए स्वतंत्रता है। इस खोई हुई स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए हमारे अनगिनत नवजवान फांसी के तख़्ते पर हँसते-हँसते झूल गए, कितनी माताओं ने अपने नौनिहालों को ममता की गोद से उछालकर भाले की नोकों पर टंग जाने के लिए हृदय पर पत्थर रख लिया, कितनी बहनों ने अपने माथे में सिंदूर के बदले राख़ का टीका लगाना स्वीकार किया। आजादी का इतिहास लिखने में काली स्याही कभी सक्षम नहीं हो पाती। उसे लिखने के लिए खून की धारा बहानी पड़ती है।
वीर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस जैसे वीर बाँकुरों की शहादत पर, बाल-पाल-लाल(बाल गंगाधर तिलक,विपिनचन्द्र पाल,लाला लाजपत राय) गोपाल कृष्ण गोखले, राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी,आचार्य विनोबा भावे,राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू,डा श्रीकृष्ण सिन्हा की तपस्या पर, वीर सुभाष और सावरकर के दुर्दांत साहस पर, जलियांवाला बाग की रक्त सिंचित भूमि की बयार पर स्वतंत्रता का सूरज चमका था – इसी 15 अगस्त 1947 के दिन। अंग्रेज शासकों ने अपना बोरिया बिस्तर गोल किया था और भागे थे सात समंदर पार।
15 अगस्त 1947 को सारे भारतवर्ष में यह स्वतंत्रता दिवस किस धूमधाम और किस शान शौकत से मनाया गया था – इसे वे ही जानते हैं जिन्होंने अपनी आँखों इसे देखा होगा। लगता था हमारी धरती के भाग्य फिर से जाग उठे हैं। बहुत दिनों की बीमारी से मुक्त व्यक्ति को जिस प्रकार भोजन अच्छा लगता है, बहुत दिनों तक अँधेरे बंद कमरे में कैद रहने के बाद खुली हवा जितनी मनभावनी लगती है वही स्थिति उस दिन भारत में बच्चे-बच्चे की थी। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में हमारे मनप्राणों में एक रागिनी बज रही थी:-
नहीं चाहते हम धन वैभव, नहीं चाहते हम अधिकार।
बस स्वतंत्र रहने दो हमको और स्वतंत्र कहे संसार।।
तब से हर वर्ष यह 15 अगस्त हमारे समक्ष एक राष्ट्रीय पर्व की भांति आता है। खुशियों की बहार लूटा जाता है। इस दिन देश भर में जन अवकाश रहता है। कचहरी कार्यालय, न्यायालय राजकीय भवन, विद्यालय, महाविद्यालय, सब पर तिरंगा झण्डा फहराया जाता है। जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता। यह राष्ट्रगीत हमारे मन प्राणों को ऊर्जस्वित करता है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कार्यालयों में झंडोत्तोलन करके चाहे राजनेता अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लें, लेकिन आज के दिन अपनी बात कहते समय हम उन सपूतों को नहीं भूल सकते, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर भारत माता की जंजीरें तोड़ी हैं।15 अगस्त आनंद और त्याग का मंगल पर्व तो है ही,साथ ही हमारी वंदना और कचोट, हमारे आत्म दर्शन और आत्म परीक्षण का स्मारक दिवस भी है।यदि हम अपने इस कर्दममय वर्तमान से सचेत नहीं हुए तो हमारी आजादी की नौका इसी में फंस जाएगी, जिससे उबर पाना बहुत मुश्किल होगा।यदि समय रहते हमने समस्याओं की अंधी घाटियों को पार नहीं किया,तो हमारी स्वतंत्रता का सूरज डूब जाएगा और तब पता नहीं कितनी लंबी रातों के बाद पुनः नया सबेरा दमकेगा।
राष्ट्रकवि दिनकर ने लिखा है कि आजादी तप,त्याग और बलिदान मांगती है:-
आंधियाँ नहीं जहां उमंग भरती हैं
छातियाँ जहाँ संगीनों से डरती हैं।
शोणित के बदले जहाँ अश्रु बहता है,
वह देश कभी स्वाधीन नही रहता है।
राष्ट्रकवि दिनकर ने अपनी प्रणति शीर्षक कविता अपनी लेखनी से उनका जय गान करने का आह्वान किया है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए तन,मन और धन सब कुछ न्योछावर कर दिया है:-
कलम आज उनकी जय बोल!
जला अस्थियां बारी बारी,
छिटकाई जिसने चिनगारी।
जो चढ़ गये पुण्य वेदी पर,
लिये बिना गरदन का मोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे,
तूफानों में एक किनारे।
जल जल कर बुझ गये
किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम आज उनकी जय बोल!
अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा।
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूरज चंद्र भूगोल खगोल।
कलम आज उनकी जय बोल!
राष्ट्रकवि दिनकर ने मातृभूमि के ऐसे सपूतों को शतश:नमन,वंदन और अभिनंदन किया है:-
नमन उन्हें मेरा शत बार।
सूख रही है बोटी बोटी,
मिलती नहीं घास की रोटी,
गढ़ते हैं इतिहास देश का,
सहकर कठिन क्षुधा की मार।
नमन उन्हें मेरा शत बार।
वीर तुम्हारा लिए सहारा,
टिका हुआ है भूतल सारा।
होते तुम न कहीं तो,
कब का उलट गया होता संसार।
नमन उन्हें मेरा शत बार।
चरण धूलि दो शीश लगा लूं,
जीवन का बल तेज सजा लूं।
मैं निवास जिस मूक स्वप्न का,
तुम उसके सक्रिय अवतार।
नमन उन्हें मेरा शत बार।
आज हमें स्मरण रखना चाहिए कि शताब्दियों की साधना का यह पौधा अक्षयवट तभी बन सकता है,जब हम अपने स्वार्थों के कुत्सित घेरे मिटा दें,राष्ट्र प्रेम का दिव्य उत्स हमारे रोम रोम में फूटे।इसके संरक्षण संवर्धन के लिए हम त्याग और तपस्या के अग्नि पथ की यात्रा निरंतर जारी रखें।आज भारत आजादी का अमृतमहोत्सव मना चुका है।हमने सभी क्षेत्रों में विकास किया है,हम आत्म निर्भर हुए हैं और विश्व में हमारा मान सम्मान बढ़ा है-यह गौरव का संदर्भ है।आज के इस पावन पुनीत अवसर पर हम प्रभु से समस्त प्राणियों के लिए मंगलमय भविष्य की कामना चाहते हैं:-
सर्वे भवंतु सुखिनः,सर्वे संतु निरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्त,मा कश्चित् दुख भाग भवेत्।
जय हिंद जय भारत वंदेमातरम



