
- राजकीय सम्मान के साथ किया गया था बंदी उरांव का अंतिम संस्कार
- बाबा बंदी उरांव का 6 अप्रैल 2021 को 90 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया था
दयानंद राय
नेता वो नहीं होता जो लोगों पर राज करता है, नेता वो होता है जो लोगों के दिलों पर राज करता है। जननायक बाबा बंदी उरांव ये सच्चाई पुलिस की अपनी नौकरी के दौरान ही समझ चुके थे और इस समय कार्तिक उरांव अपने कार्यों से उनके आदर्श बन चुके थे, इसलिए विधायक बनते ही उन्होंने अपने कार्यों से लोगों के दिलों पर राज करना शुरू किया और लगातार चार दफा सिसई से विधायक चुने गए।
वे लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याओं की नब्ज पकड़ते थे और जहां तक संभव हो सके उसका समाधान करा कर ही मानते थे, लोगों का उनके प्रति इतना भरोसा था कि लोग उनकी ईमानदारी की कसमें खाते थे, लोगों के भरोसे को उन्होंने जीवनपर्यंत कायम रखा और आज भी उन्हें याद करनेवाले लोग उन्हें महान शख्सियत बताते हैं।
डॉ रामेश्वर उरांव के गुरू थे बाबा बंदी उरांव
उन्हें याद करते हुए पूर्व मंत्री और लोहरदगा से कांग्रेस विधायक डॉ रामेश्वर उरांव कहते हैं कि बाबा बंदी उरांव पुलिस अधिकारी के रूप में हमारे गुरु थे। उनसे हमारे पारिवारिक रिश्ते थे।
वे एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी अपने विचारों, सिद्धांतों और आदिवासी समुदाय के हितों के लिए लगा दी, 1980 में गिरिडीह जिले के एसपी के पद पर कार्य करते हुए बंदी उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र देकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की, ग्राम सभा की अवधारणा का सृजन किया, तो वहीं दूसरी ओर पेसा कानून को लेकर लंबा संघर्ष भी किया, भूरिया कमेटी के सदस्य के रूप में बीडी शर्मा के साथ मिलकर आदिवासी समुदाय के अधिकार और कर्तव्य के लिए उन्हें जागृत किया। झारखंड ही नहीं पूरे देश के आदिवासियों में उनकी एक अलग पहचान थी।

भ्रष्टाचारियों का कभी साथ नहीं दिया
उन्हें याद करते हुए कांग्रेस नेता पतितपावन शाही कहते हैं कि वे विद्यालय के समय से ही अनुशासन प्रिय थे। जननेता के रूप में उन्होंने हमेशा आम जनता के हित को तरजीह दी और भ्रष्टाचारियों का कभी साथ नहीं दिया। कार्तिक बाबू की तरह ही वे रिश्वत के घोर विरोधी थे। विधायक, मंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष रहने के बाद भी वे एक छोटे से मकान में रहते थे और अपनी पुरानी जीप खुद चलाते थे।
समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए हमेशा चिंतित रहा करते थे
बाबा बंदी उरांव गांधीवादी विचारधारा के व्यक्ति थे, वे झारखंड की कृषि संस्कृति से परिचित थे इसलिए यहां बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वे अपने कार्यों के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी थे, श्रीमती गांधी ने ही उन्हें पूर्णिया के रुपसपुर गांव में हुए नरसंहार की जांच का जिम्मा सौंपा था। वे तब पूर्णिया के एसपी थे। इस घटना के दोषियों को वे आजीवन कारावास की सजा दिला कर ही माने थे।
जनता को हक दिलाना जीवन का मकसद रहा

जननायक के रुप में गरीबों और वंचितों को उनका हक दिलाने के लिए वे हमेशा प्रयत्नशील रहे। शोषकों के खिलाफ आवाज उठाने में वे कभी नहीं डरे और वही किया जो न्यायसंगत था। वे जमीनी स्तर पर जन-जन के जीवन में बदलाव लाना चाहते थे, वे आदिवासी संस्कृति के रक्षक थे और समृद्ध आदिवासी परंपरा का उत्थान चाहते थे।
वे परंपरा और आधुनिकता के संगम थे और राजनीति उनके लिए पेशा नहीं सेवा का जरिया था। अपने काम को शिद्दत से निभाना वे जानते थे। इसलिए अपने निधन के बाद भी बाबा बंदी उरांव अपने कार्यों से अमर हैं और आज भी उन्हें याद करते हुए जन-जन उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है, लोकनायक को याद करता है।

