

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 20 साल पुराने चंदवा थाना कांड संख्या 106/2006 में फैसला सुनाया है। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने संतोष लोहरा और बलेश्वर गंझू की आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)(a) के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी है। वहीं, आरोपी अकालू गंझू को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।





अमझरिया डाक बंगला के पास हुई थी गिरफ्तारी
मामला 3 सितंबर 2006 का है। पुलिस को सूचना मिली थी कि अमझरिया डाक बंगला के पास कुछ लोग किसी अपराध की योजना बना रहे हैं। सूचना के आधार पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और छह लोगों को गिरफ्तार किया।
पुलिस के मुताबिक, तलाशी के दौरान संतोष लोहरा के पास से एक लोडेड देशी पिस्तौल और बलेश्वर गंझू के पास से सिंगल बैरल बंदूक बरामद हुई थी। इसके बाद चंदवा थाना में IPC की धारा 399, 402, 414 और आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
डकैती की तैयारी का आरोप साबित नहीं हुआ
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि केवल पांच या उससे ज्यादा लोगों का एक जगह मौजूद होना और कुछ लोगों के पास हथियार मिलना, अपने आप में डकैती की तैयारी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष डकैती की किसी ठोस तैयारी या प्रस्तावित वारदात से जुड़ा पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका। इसी आधार पर संतोष लोहरा को IPC की धारा 402 के आरोप से राहत दी गई। साथ ही आर्म्स एक्ट की धारा 26(1) के तहत उसकी दोषसिद्धि भी रद्द कर दी गई।
हथियार रखने के मामले में दो दोषी
हालांकि, पुलिस गवाहों के बयान और हथियारों की तकनीकी जांच को देखते हुए हाईकोर्ट ने संतोष लोहरा और बलेश्वर गंझू के खिलाफ आर्म्स एक्ट की धारा 25(1-B)(a) का आरोप साबित माना। दोनों की इस मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
वहीं, अकालू गंझू के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दूसरे आरोपियों के साथ पकड़े जाने से उसके खिलाफ हथियार पर सचेत या संयुक्त कब्जा साबित नहीं होता। इसी आधार पर उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
जेल में बिताई अवधि तक सीमित की सजा
हाईकोर्ट ने सजा तय करते समय इस बात को भी ध्यान में रखा कि घटना को करीब दो दशक बीत चुके हैं। संतोष लोहरा और बलेश्वर गंझू पहले ही क्रमशः दो साल से अधिक और करीब 10 महीने जेल में रह चुके हैं।
ऐसे में कोर्ट ने दोनों की सजा को पहले से जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया। दोनों की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उन्हें बेल बॉन्ड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।
