
जब किसी बच्चे का रोने का मन करता है तो बात-बात पर कोई बहाना निकाल ही लेता है। यही हाल आजकल बिहार में एक-दो राजनीतिक बिरादरियों के अधिकाधिक लोगों का हो गया है। सामने वाला कोई साधारण-सी बात बोल दे या चिकोटी काट दे, तो सारा आसमां सिर पर उठाकर ये रोना-गाना शुरू कर दे रहे हैं। मान लिया किसी ने यदि गलत बात कर दी, तो कानून के निजाम में उसके लिए मुक्कमल धाराएं हमारी दंड संहिता में मौजूद हैं। आप धमकी और गाली देने को यदि अपनी ताक़त समझ रहे हैं, तो आप मुगालते में हैं। ऊपर से अगलगुआ फटफटिया मीडिया के फट-फटी का रोग पुराना है। मुझे याद है कि 2005 के आखिरी महीने में नीतीश कुमार जब बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनके पहले कार्यकाल में बिहार के लिए कई जरूरी काम हो रहे थे। फिर भी कुछ लोग ऐसे थे, जो नीतीश कुमार को क्या-क्या नहीं कहते थे। उनको परिस्थितियों का मुख्यमंत्री, आरएसएस एजेंट बताने के बाद भी मन नहीं भरता तो तमाम रेलगाड़ियों के नाम से उनके नाम जोड़े जाते। गनीमत हो कि उस समय सोशल मीडिया नाम की चिड़िया उड़नी शुरू नहीं हुई थी।
नीतीश चाचा से एक बात जो राजनीति में सबके सीखने योग्य है। अपने मुंह से विरोधी की सवालों का जवाब खुद तब तक नहीं दो, जब तक कि आप अपनी तरफ से उस काम को पूरा नहीं करवा दो। नीतीश चाचा का एक सौभाग्य यह रहा कि उनके साथ डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी हुए। विरोधियों के हर हमले को भटकाने की कैफियत सुशील जी में कूट-कूट कर भरी थी। सुशील जी ने बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की सारी कुंडली जमा कर रखी थी। वह बीच-बीच में कुछ ऐसे मुद्दे छेड़ देते कि विरोधियों का हमला नीतीश चाचा की जगह उनकी ओर शिफ्ट हो जाता। नीतीश चाचा पर तब बड़े आरोप लगते थे कि उन्होंने बिहार की सत्ता में आने के लिए सामान्य वर्ग से आने वाले अपराधियों/बाहुबलियों (आनंद मोहन, मुन्ना शुक्ला, अनंत सिंह, सुनील पांडे आदि) की मदद ली। यह सच है कि ये लोग नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने में मददगार रहे।नीतीश चाचा ने बिहार को बदलने के लिए राह की परवाह नहीं की, लेकिन एक-एक कर इन तमाम बाहुबलियों को जेल भी भिजवा दिया, जबकि सभी के पास राजनीतिक इम्युनिटी थी। उन पर आरोप लगे कि NDA समर्थक मानी जाने वाली एक अन्य राजनीतिक जाति के सामने उन्होंने सरेंडर कर दिया है।
दरअसल, नीतीश चाचा ने अपनी सरकार बनते ही ललन सिंह के जिम्मे जदयू के प्रदेश नेतृत्व की कमान दे दी। पुलिस विभाग के नेतृत्व की कमान भी ललन जी के समाज से आने वाले एक IPS को सौंप दी। नीतीश चाचा जानते थे कि अशांत हो चुके बिहार को शांति दिलाने के लिए सिर्फ दिमाग नहीं, बल्कि बल भी चाहिए। वह जानते थे कि ‘लड्डू से लड्डू लड़ेगा, तभी बुंदिया झड़ेगा।’ यही हुआ भी। नीतीश चाचा से मीडिया ने इस संदर्भ जब सवाल किया तो उन्होंने कहा कि उनके विरोधी लोग क्या कहते हैं, उस पर मत जाइये। बताइए दोनों लोग काबिल हैं या नहीं? मीडिया चुप। कुछ लोगों को अपने समीकरण की संख्या का गुमान ऐसा रहा है कि उनका दल पक्ष में हों या विपक्ष में, अन्य को वे साग-पात समझते रहे। ऐसी स्थिति में जब उनके खिलाफ मजबूत एकीकरण का प्रयास हुआ तो उससे चिढ़ स्वभाविक रूप से रही। लव-कुश की राजनीतिक एका को 1995 में ऐसे ही उस समय के बिहार के सबसे बड़े नेता ने ‘कुकुर’ नहीं कह दिया था। उनको पता था कि यही एका एक दिन उनके सत्ता के समीकरण को बदल देगा। इसी के बाद नीतीश चाचा ने अपना उभार होते ही सामाजिक इंजीनियरिंग की ऐसी बिसात बिछाई कि 2010 में संख्याबल का गुमान करने वाले तड़प कर रह गये। इस स्वभाविक लोकतांत्रिक परिवर्तन को हजम करने में कुछ लोगों को तब भी दिक्कत महसूस हुई और आज भी वह दिक्कत महसूस हो रही है। असल दिक्कत यह है कि आज सोशल मीडिया है, तो बातों की खाल निकाल ली जाती है, उसका तोड़-मरोड़ जारी है।
नीतीश चाचा के मुख्यमंत्री रहते नालंदा के लोगों ने इतने ताने सुने होंगे कि मत पूछिये। उनकी मेहनत और मेरिट को सरकारी तंत्र के सेटिंग से जोड़ दिया गया। चाहते तो वे भी पलट कर गालियां दे सकते थे, लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी पाने की ओर अपना फोकस बनाये रखा। आज बिहार के सबसे विकसित जिलों में से एक नालंदा है, तो इसमें नीतीश चाचा की योजनाओं के साथ नालंदा के लोगों की मेहनत की अहम भूमिका है। बिहार सामाजिक खांचे में बंटा हुआ राज्य है। ऐसे में मैं खासकर अपने समाज के युवा साथियों से एक आग्रह करना चाहता हूं। आपको कौन बुरा-भला कह रहा है, गाली दे रहा है, उस पर कान और ध्यान मत दीजिए। आपकी जो इच्छा थी, वह पूरी हो चुकी है और जो आदमी सीएम कुर्सी पर हैं, वह बिहार के माननीय मुख्यमंत्री हैं और राजनीतिक रूप से बेहद सक्षम आदमी हैं। उनके कुछ शब्दों के फम्बल के बने मीम और उनके खिलाफ चलने वाले प्रोपगेंडा को आप फिलहाल इग्नोर कीजिए। इससे उनका कुछ बिगड़ना नहीं है।
खासकर, सोशल मीडिया पर किसी के खिलाफ तीखी टिप्पणी या प्रतिक्रिया देने से बचें, भले वह आपकी जाति को लेकर गाली ही क्यों न दे रहा हो। कानूनी कार्रवाई लायक लगे तो उसे चुपचाप बिहार पुलिस के हवाले कर दें, क्योंकि उस गाली से आपका कुछ नहीं बिगड़ना है। हां, आपकी प्रतिक्रिया से आपकी ऊर्जा का नुकसान होगा। बस जो काम आप अपने जीवन में कर रहे हैं, उसे मन लगाकर करते रहिए। अभी बगल में यूपी का चुनाव है। बहुत सी फेक ID भी बनेंगे, उसके पीछे कौन हैं, आपको नहीं मालूम, इसलिए सोशल मीडिया पर अपनी तरफ से सिर्फ सकारात्मक चीजें शेयर कीजिए व उस पर चर्चा कीजिए। किसी भी तरह की राजनीति के शिकार बनने से बचिए। सोशल मीडिया जुड़ने का माध्यम है, इसे हम अपनी तरफ से कटुता फैलाने का माध्यम न बनने दें। नीतीश चाचा के शुरुआती काल में जो बातें सीमित दायरे में होती थीं, आज सम्राट जी के काल में अब वह सार्वजनिक रूप से हो रही हैं। हर समाज में अच्छे-बुरे लोग होते हैं, पर मसला ‘लोकतांत्रिक परिवर्तन’ को हजम करने या न करने का है। किसी को परिस्थितियों का सीएम कहना और किसी को सेलेक्टेड सीएम कहना, दर्शाता है कि आप भीतर से किस कदर चिढ़े हैं। अपराधी के खिलाफ किसी की कार्रवाई को जाति विशेष के खिलाफ बताने से पहले डेटा को न जांचना, जबकि उसी सरकार के उप मुख्यमंत्री उक्त समाज से आते हैं।
‘कोई नृप हो, हमें क्या लाभ, हमें क्या हानि’? सामाजिक न्याय की धारा में एक-एक कर सबको मौका देना ही होगा। वही मौका आज हमारे एक बड़े भाई को मिला है। वह उनकी मेहनत से मिला है। किसी समूह के संख्याबल के गुमान/मिथ को नीतीश चाचा कई दफा तहस-नहस करके दिखा चुके हैं। हां, क्या हरे गमछे पर किसी का कॉपीराइट है क्या? AI का काम है भूसे की ढेर से सुई चुन लेने की। अब राजनीतिक आदमी का उदाहरण तो राजनीतिक ही होगा न? इसे कोई जाति/पार्टी से जोड़ ले तो दोष बोलने वाले का क्यों होगा? मुख्यमंत्री जी ने उसी भाषण में आगे और भी बहुत सी बातें की हैं, लेकिन यहां तो मन रोने का है, तो नजर खोंट निकालने पर टिकी होती है। खैर, इस बेचैनी को राजनीति तक ही सीमित रहना चाहिए।

